भगवान जगन्नाथ की कथा राजा इन्द्रद्युम्न की उस अद्भुत भक्ति से जुड़ी है, जिसमें एक राजा ने राजसुख, धन और वैभव से ऊपर उठकर भगवान के दिव्य दर्शन को अपने जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य बना लिया था। यह कथा न केवल भगवान के प्रति अटूट श्रद्धा की कहानी है, बल्कि यह भी बताती है कि जब भक्त सच्चे मन से भगवान को खोजता है, तो भगवान किसी न किसी रूप में उसके सामने अवश्य प्रकट होते हैं।
राजा इन्द्रद्युम्न की भगवान के दर्शन की इच्छा
प्राचीन काल में राजा इन्द्रद्युम्न नाम के एक परम धर्मात्मा, भगवान के अनन्य भक्त और प्रजावत्सल राजा हुए। उनका राज्य समृद्ध था। प्रजा सुखी थी। राजकोष भरा हुआ था। सेना शक्तिशाली थी और राजमहल वैभव से संपन्न था।
राजा के पास वह सब कुछ था, जिसे संसार सुख और सफलता का कारण मानता है। लेकिन उनके हृदय में एक ऐसी अभिलाषा थी, जिसे न राजसत्ता पूरी कर सकती थी, न धन, न मान और न ही यश।
उनके मन में बार-बार एक ही विचार उठता—
“क्या मुझे भगवान के उस दिव्य स्वरूप का दर्शन होगा, जिसे देखकर मेरा जीवन धन्य हो जाए?”
राजा केवल भगवान के विषय में सुनकर संतुष्ट नहीं थे। वे भगवान का साक्षात दर्शन करना चाहते थे। वे ऐसे दिव्य स्वरूप की खोज में थे, जिसमें उनका मन और जीवन दोनों स्थिर हो जाएँ।
एक दिन राजसभा में अनेक तीर्थों, देवस्थानों और भगवान के विभिन्न स्वरूपों की चर्चा हो रही थी। कोई द्वारका की महिमा बता रहा था, कोई बदरीनाथ की, तो कोई भगवान विष्णु के अन्य दिव्य रूपों का वर्णन कर रहा था।
तभी सभा में एक अद्भुत नाम सुनाई पड़ा—
“नीलमाधव।”
राजा इन्द्रद्युम्न जैसे चौंक पड़े।
उन्होंने तुरंत पूछा—
“नीलमाधव? यह कौन-सा स्वरूप है? और कहाँ विराजमान हैं?”
उन्हें बताया गया—
“महाराज, उत्कल प्रदेश के घने वन में भगवान विष्णु नीलमाधव नाम से विराजमान हैं। वह स्थान सामान्य लोगों की पहुँच से बाहर है। न वहाँ कोई विशाल मंदिर है और न कोई राजमार्ग। भगवान का स्थान अत्यंत गोपनीय है।”
राजा ने फिर पूछा—
“तो उनकी सेवा कौन करता है?”
उत्तर मिला—
“एक शबर प्रमुख हैं, जिनका नाम विश्वावसु है। वही गुप्त रूप से भगवान नीलमाधव की सेवा करते हैं।”
अब राजा इन्द्रद्युम्न के मन में नीलमाधव के दर्शन की तीव्र इच्छा जाग उठी।
उन्होंने कहा—
“यदि पृथ्वी पर भगवान का ऐसा दिव्य स्वरूप विराजमान है, तो उनकी खोज अवश्य की जाएगी।”
नीलमाधव की खोज में निकले दूत
राजा ने तुरंत योग्य ब्राह्मणों, सेवकों और दूतों को बुलाया।
उन्होंने आदेश दिया—
“चारों दिशाओं में जाओ। पर्वतों, वनों, नदी-तटों, आश्रमों और तीर्थों में खोज करो। नीलमाधव का पता लगाकर ही लौटना।”
सभी अलग-अलग दिशाओं में निकल पड़े।
कई दिन बीत गए।
फिर एक-एक करके खोजी वापस लौटने लगे।
कोई कहता—
“महाराज, बहुत खोज की, लेकिन नीलमाधव का कोई पता नहीं चला।”
कोई कहता—
“लोगों ने नाम तो सुना है, लेकिन स्थान कोई नहीं बता पाया।”
कोई कहता—
“वन इतना दुर्गम है कि आगे जाना कठिन हो गया।”
राजा हर बार आशा से पूछते और हर बार निराशा का उत्तर मिलता।
लेकिन एक व्यक्ति अभी तक वापस नहीं आया था।
वह था—विद्यापति।
विद्यापति और विश्वावसु की भेंट
विद्यापति अत्यंत बुद्धिमान, धैर्यवान और संकल्पशील ब्राह्मण थे। उन्होंने मन में निश्चय कर रखा था—
“जब तक मैं अपनी पूरी सामर्थ्य से खोज नहीं कर लेता, वापस नहीं लौटूँगा।”
वे एक वन से दूसरे वन, एक ग्राम से दूसरे ग्राम और एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जाते रहे।
मार्ग कठिन होता गया। कहीं पथरीली भूमि थी, कहीं घना वन और कहीं काँटों से भरी झाड़ियाँ।
चलते-चलते एक दिन संध्या होने लगी। सूर्य अस्त होने को था और विद्यापति एक अत्यंत दुर्गम वन क्षेत्र में पहुँच चुके थे।
न कोई नगर था, न कोई धर्मशाला और न कोई परिचित व्यक्ति।
तभी दूर उन्हें कुछ वनवासी दिखाई दिए। उनमें एक प्रमुख व्यक्ति था—विश्वावसु।
विश्वावसु ने विद्यापति को देखा और पूछा—
“ब्राह्मण देवता, इस समय इस वन में कैसे आना हुआ?”
विद्यापति ने विनम्रता से कहा—
“मार्ग लंबा था। रात्रि होने वाली है। यदि एक रात आश्रय मिल जाए तो बड़ी कृपा होगी।”
विश्वावसु ने अतिथि समझकर उनका स्वागत किया। उन्हें अपने निवास पर ले गया, भोजन कराया और विश्राम का स्थान दिया।
विद्यापति ने मन में सोचा—
“यह व्यक्ति सरल प्रतीत होता है। कुछ दिनों तक यहाँ रुककर आसपास की जानकारी प्राप्त करनी चाहिए।”
वे वहीं रहने लगे।
कुछ समय बीता।
अब विद्यापति ने विश्वावसु की दिनचर्या पर ध्यान देना शुरू किया।
उन्होंने देखा कि विश्वावसु प्रतिदिन एक निश्चित समय पर घर से निकलता। वह किसी को साथ नहीं ले जाता और कई घंटे तक वापस नहीं आता।
लेकिन जब वह लौटता, तो उसके शरीर से एक अद्भुत सुगंध आती।
कभी पुष्पों की महक, कभी चंदन जैसी सुगंध और कभी ऐसा लगता जैसे वह किसी मंदिर में पूजा करके आया हो।
विद्यापति के मन में प्रश्न उठा—
“यह वन में कहाँ जाता है?”
एक दिन उन्होंने सहज भाव से पूछा—
“विश्वावसुजी, आप प्रतिदिन इतने समय के लिए कहाँ जाते हैं?”
विश्वावसु मुस्कुराया, लेकिन उसने कोई उत्तर नहीं दिया।
दूसरे दिन भी यही हुआ।
तीसरे दिन भी।
अब विद्यापति को लगने लगा कि यह अवश्य कोई महत्वपूर्ण रहस्य है।
उन्होंने एक दिन स्पष्ट पूछा—
“क्या आप किसी देवता की पूजा करने जाते हैं?”
विश्वावसु कुछ क्षण मौन रहा। उसके चेहरे पर गंभीरता आ गई।
विद्यापति ने फिर कहा—
“मैं आपकी गोपनीयता का अपमान नहीं करना चाहता। लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि आप किसी अत्यंत पवित्र स्थान से लौटते हैं।”
कुछ दिनों बाद विश्वावसु ने धीमी आवाज में कहा—
“हाँ, मैं अपने आराध्य की सेवा करने जाता हूँ।”
विद्यापति ने पूछा—
“आपके आराध्य कौन हैं?”
विश्वावसु ने कुछ क्षण नेत्र बंद किए और कहा—
“नीलमाधव।”
यह नाम सुनते ही विद्यापति का शरीर रोमांचित हो उठा।
उन्हें लगा जैसे उनकी लंबी यात्रा का लक्ष्य उनके सामने आ गया हो।
उन्होंने तुरंत कहा—
“नीलमाधव! मैं तो उन्हीं की खोज में निकला हूँ। मुझे उनके दर्शन करा दीजिए।”
लेकिन विश्वावसु ने तुरंत मना कर दिया।
“नहीं। यह संभव नहीं है। भगवान का स्थान गुप्त है।”
विद्यापति ने कहा—
“मैं किसी अपवित्र भाव से नहीं आया हूँ। मेरे राजा इन्द्रद्युम्न भगवान के दर्शन के लिए व्याकुल हैं। मुझे एक बार दर्शन करा दीजिए।”
विश्वावसु ने फिर मना किया।
लेकिन विद्यापति ने अपना आग्रह नहीं छोड़ा।
अंततः विश्वावसु ने कहा—
“ठीक है। मैं तुम्हें ले जाऊँगा। लेकिन एक शर्त होगी।”
विद्यापति बोले—
“जो भी शर्त हो, स्वीकार है।”
विश्वावसु ने कहा—
“तुम्हारी आँखों पर पट्टी बाँधी जाएगी। तुम मार्ग नहीं देखोगे। मैं तुम्हें केवल भगवान के दर्शन कराऊँगा, स्थान का रास्ता नहीं बताऊँगा।”
विद्यापति ने शर्त स्वीकार कर ली।
सरसों के दानों से खोजा भगवान का मार्ग
अगले दिन सुबह तैयारी हुई। विश्वावसु ने विद्यापति की आँखों पर कपड़े की पट्टी बाँध दी।
कथा-परंपरा के अनुसार, विद्यापति अपने साथ सरसों के छोटे-छोटे दाने लेकर चले थे।
विश्वावसु उनका हाथ पकड़कर आगे बढ़ा।
पहले समतल मार्ग आया। फिर ऊबड़-खाबड़ भूमि। कभी चढ़ाई, कभी उतराई और कभी घने वृक्षों के बीच से होकर पगडंडी।
विद्यापति कुछ देख नहीं सकते थे।
लेकिन चलते-चलते वे चुपचाप सरसों के दाने गिराते गए।
उनके मन में विचार था—
“आज मैं मार्ग नहीं देख पा रहा हूँ, लेकिन यदि ये बीज अंकुरित हुए तो एक दिन यह रास्ता पहचान में आ जाएगा।”
लंबी यात्रा के बाद विश्वावसु रुक गया।
उसने कहा—
“हम पहुँच गए।”
धीरे से विद्यापति की आँखों की पट्टी खोली गई।
विद्यापति ने जैसे ही आँखें खोलीं, वे सामने का दृश्य देखकर कुछ क्षण के लिए स्तब्ध रह गए।
वन के उस एकांत में भगवान नीलमाधव विराजमान थे।
चारों ओर प्रकृति की शांति थी। वातावरण में मंद सुगंध थी और पवित्रता का ऐसा अनुभव हो रहा था, मानो पूरा वन ही मंदिर बन गया हो।
विद्यापति के मुख से शब्द नहीं निकले।
वे भूमि पर गिर पड़े और हाथ जोड़कर बोले—
“प्रभो! आपकी खोज में कितना भटका, और आज आप मेरे सामने हैं।”
उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।
विश्वावसु अपने आराध्य की सेवा में लग गया। वह भगवान को पुष्प अर्पित करता, जल चढ़ाता और पूजा करता।
विद्यापति शांत भाव से सब देखते रहे।
लेकिन उनके मन में एक ही विचार था—
“राजा इन्द्रद्युम्न को यह समाचार शीघ्र देना चाहिए।”
राजा इन्द्रद्युम्न को मिला नीलमाधव का समाचार
कुछ समय बाद विद्यापति वहाँ से लौटे।
अब उनके भीतर केवल एक ही उत्कंठा थी—राजा तक पहुँचना।
लंबी यात्रा के बाद वे राजमहल पहुँचे।
राजा इन्द्रद्युम्न ने जैसे ही उन्हें देखा, तत्काल पूछा—
“विद्यापति! कुछ समाचार मिला?”
विद्यापति ने प्रणाम किया और कुछ क्षण मौन रहने के बाद कहा—
“महाराज, नीलमाधव मिल गए।”
राजा की आँखें चमक उठीं।
उन्होंने पूछा—
“स्थान मिल गया?”
विद्यापति ने कहा—
“महाराज, केवल स्थान नहीं मिला। मैंने स्वयं भगवान नीलमाधव के दर्शन किए हैं।”
राजा जैसे वर्षों से इसी क्षण की प्रतीक्षा कर रहे थे।
उन्होंने तुरंत कहा—
“तैयारी करो। हम अभी चलेंगे।”
यात्रा की व्यवस्था हुई। राजा इन्द्रद्युम्न स्वयं नीलमाधव के दर्शन के लिए निकल पड़े।
विद्यापति मार्गदर्शन कर रहे थे और राजा का मन प्रत्येक क्षण भगवान के दर्शन की ओर बढ़ रहा था।
आखिर वह स्थान निकट आया।
विद्यापति ने कहा—
“महाराज, यही क्षेत्र है।”
राजा तेजी से आगे बढ़े।
लेकिन वहाँ पहुँचकर अचानक रुक गए।
उन्होंने चारों ओर देखा।
फिर विद्यापति की ओर देखकर पूछा—
“नीलमाधव कहाँ हैं?”
विद्यापति स्वयं स्तब्ध थे।
उन्होंने कहा—
“महाराज, मैंने यहीं दर्शन किए थे।”
लेकिन भगवान वहाँ दिखाई नहीं दे रहे थे।
वन वही था। स्थान वही था।
लेकिन नीलमाधव वहाँ नहीं थे।
नीलमाधव अंतर्धान हो चुके थे।
नीलमाधव के अंतर्धान के बाद राजा की भक्ति
राजा इन्द्रद्युम्न का हृदय टूट गया।
उन्होंने कहा—
“विद्यापति को दर्शन मिले, विश्वावसु वर्षों तक सेवा करता रहा और जब मैं आया तो भगवान अंतर्धान हो गए!”
राजा वहीं भूमि पर बैठ गए। उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।
उन्होंने भगवान से प्रार्थना की—
“हे प्रभु! यदि आप दर्शन नहीं देना चाहते थे तो मुझे यहाँ तक आने की इच्छा क्यों दी?”
“यदि मुझसे कोई अपराध हुआ है तो मुझे दंड दीजिए, लेकिन अपने दर्शन से वंचित मत कीजिए।”
उसी समय देवर्षि नारद वहाँ उपस्थित हुए।
नारदजी ने राजा को संभाला और कहा—
“राजन्, जो तुम्हें अंत दिखाई दे रहा है, वही एक नई लीला का प्रारंभ है।”
राजा ने पूछा—
“क्या प्रभु फिर दर्शन देंगे?”
नारदजी बोले—
“भगवान नीलमाधव के उसी रूप में नहीं, बल्कि एक नए रूप में प्रकट होंगे।”
राजा ने हाथ जोड़कर पूछा—
“मुझे क्या करना होगा?”
नारदजी ने उन्हें भगवान की आराधना, यज्ञ और पुरुषोत्तम क्षेत्र में मंदिर निर्माण का संकल्प करने का निर्देश दिया।
राजा ने कहा—
“भगवान अभी प्रकट हों या बाद में, मैं उनके लिए मंदिर अवश्य बनवाऊँगा।”
इसके बाद मंदिर निर्माण की व्यवस्था होने लगी।
कुशल शिल्पकार बुलाए गए। भूमि का चयन हुआ। भगवान की पूजा, अनुष्ठान और यज्ञ प्रारंभ हुए।
दिन बीतते गए और मंदिर का निर्माण आगे बढ़ता गया।
लेकिन राजा के सामने सबसे बड़ा प्रश्न अब भी था—
“मंदिर तो बन जाएगा, लेकिन भगवान किस रूप में विराजेंगे?”
समुद्र से आया दिव्य काष्ठ और दारु-ब्रह्म
एक दिन राजा को दिव्य संकेत प्राप्त हुआ—
“समुद्र की ओर देखो। वहीं से मेरे नए स्वरूप का माध्यम आएगा।”
कुछ समय बाद समुद्र में एक अद्भुत दृश्य दिखाई दिया।
लहरों के साथ एक विशाल काष्ठ का खंड तट की ओर आता दिखाई दिया।
समाचार तुरंत राजा तक पहुँचा।
राजा समुद्र तट पर पहुँचे और उस काष्ठ को देखा।
वह साधारण लकड़ी जैसी नहीं लग रही थी।
राजा ने श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया।
यहाँ कथा-परंपरा से जुड़ी एक महत्वपूर्ण बात समझना आवश्यक है।
संस्कृत में “दारु” का अर्थ काष्ठ या लकड़ी होता है। इसी कारण भगवान जगन्नाथ से जुड़े इस दिव्य काष्ठ को परंपरा में “दारु-ब्रह्म” कहा जाता है।
राजा ने सेवकों से कहा—
“इसे अत्यंत सम्मान से उठाकर ले चलो।”
कई सेवक आगे बढ़े।
उन्होंने उसे उठाने का प्रयास किया।
लेकिन काष्ठ हिला तक नहीं।
और लोग बुलाए गए।
फिर प्रयास हुआ।
बलवान पुरुष लगाए गए। रस्सियाँ बाँधी गईं।
लेकिन काष्ठ वहीं रहा।
राजा आश्चर्यचकित हो गए।
उन्होंने सोचा—
“यह साधारण वस्तु नहीं है।”
तभी भगवान की पूर्व सेवा से जुड़े विश्वावसु और भगवान की खोज करने वाले विद्यापति को बुलाया गया।
दोनों श्रद्धा से आगे आए।
उन्होंने भगवान को प्रणाम किया और उनका नाम लिया।
कथा-परंपरा के अनुसार, इसके बाद दिव्य काष्ठ को वहाँ से ले जाने का कार्य संभव हुआ।
राजा ने उसे अत्यंत सम्मान के साथ सुरक्षित स्थान पर रखवाया।
अब एक नई समस्या सामने थी—
“इस दिव्य काष्ठ से भगवान का विग्रह कौन बनाएगा?”
वृद्ध शिल्पकार और भगवान के दिव्य स्वरूप
राजा ने राज्य के श्रेष्ठ शिल्पियों को बुलाया।
वे अपने औजार लेकर आए। उन्होंने दिव्य काष्ठ को देखा और कार्य प्रारंभ करना चाहा।
लेकिन सामान्य शिल्प-कौशल से कार्य सफल नहीं हो रहा था।
राजा की चिंता बढ़ गई।
एक दिन राजदरबार में एक अत्यंत वृद्ध शिल्पकार आया।
शरीर वृद्ध था, चाल धीमी थी, लेकिन मुख पर अद्भुत तेज था।
वह राजा के सामने आया और बोला—
“राजन्, सुना है कि आप भगवान के विग्रह बनवाना चाहते हैं।”
राजा ने कहा—
“हाँ, लेकिन हमारे श्रेष्ठ शिल्पकार भी सफल नहीं हुए।”
वृद्ध ने शांत स्वर में कहा—
“यदि अनुमति दें तो मैं यह कार्य कर सकता हूँ।”
राजा ने पूछा—
“क्या तुम्हें विश्वास है?”
वृद्ध बोला—
“कार्य मेरा नहीं, भगवान का है। लेकिन मेरी एक शर्त है।”
राजा ने कहा—
“बताओ।”
वृद्ध शिल्पकार ने कहा—
“मुझे एक बंद कक्ष में दिव्य काष्ठ के साथ अकेला छोड़ दिया जाए। द्वार बंद रहेगा। कोई भीतर नहीं आएगा। जब तक मैं स्वयं कार्य पूर्ण न कर लूँ, कोई द्वार नहीं खोलेगा।”
राजा ने पूछा—
“और यदि कई दिन बीत जाएँ?”
वृद्ध बोला—
“फिर भी द्वार नहीं खुलेगा।”
राजा ने वचन दे दिया।
दिव्य काष्ठ कक्ष के भीतर रखा गया। वृद्ध शिल्पकार भीतर गया और द्वार बंद कर दिया गया।
कुछ देर बाद भीतर से औजार चलने की आवाज आने लगी—
ठक… ठक… ठक…
राजा बाहर से यह आवाज सुनते और उनके चेहरे पर प्रसन्नता आ जाती।
वे सोचते—
“मेरे प्रभु का स्वरूप बन रहा है।”
एक दिन बीता।
दूसरा दिन बीता।
कई दिन बीत गए।
भीतर से काम की आवाज आती रही।
फिर अचानक एक दिन आवाज बंद हो गई।
पूर्ण मौन।
न औजारों की ध्वनि और न ही वृद्ध शिल्पकार की कोई आवाज।
महारानी को चिंता हुई।
उन्होंने राजा से कहा—
“इतने वृद्ध व्यक्ति हैं। कई दिनों से भीतर हैं। न भोजन लिया, न जल। अब कोई आवाज भी नहीं आ रही। कहीं उनके साथ कोई अनहोनी तो नहीं हो गई?”
राजा ने कहा—
“लेकिन हमने वचन दिया है। द्वार नहीं खोलना है।”
महारानी बोलीं—
“यदि भीतर उनका जीवन संकट में हो तो?”
राजा दुविधा में पड़ गए।
एक ओर दिया हुआ वचन था और दूसरी ओर वृद्ध शिल्पकार की चिंता।
कुछ समय और प्रतीक्षा हुई।
लेकिन भीतर से अब भी कोई आवाज नहीं आई।
अंततः द्वार खोलने का निर्णय लिया गया।
श्री जगन्नाथ, बलभद्र और माता सुभद्रा का प्राकट्य
द्वार खुला।
राजा भीतर पहुँचे।
उन्होंने चारों ओर देखा।
वृद्ध शिल्पकार वहाँ नहीं था।
कक्ष बंद था और कोई दूसरा मार्ग भी नहीं था।
राजा आश्चर्यचकित रह गए—
“वह गया कहाँ?”
तभी उनकी दृष्टि सामने पड़ी।
वहाँ तीन अद्भुत विग्रह उपस्थित थे—
श्री जगन्नाथ।
श्री बलभद्र।
माता सुभद्रा।
राजा कुछ क्षण उन्हें देखते रहे।
उनके नेत्र विशाल थे। मुखाकृति अद्भुत थी और स्वरूप सामान्य मानवीय देव-विग्रहों से भिन्न था।
उनके अंग पूर्ण मानवीय आकार में निर्मित नहीं थे।
राजा के मन में तुरंत विचार आया—
“हाय! मैंने द्वार जल्दी खुलवा दिया। कार्य अभी पूरा नहीं हुआ था।”
वे अत्यंत दुःखी हुए।
उन्होंने सिर पकड़ लिया और कहा—
“यदि मैं कुछ दिन और प्रतीक्षा कर लेता तो मेरे प्रभु का स्वरूप पूर्ण हो जाता।”
तभी देवर्षि नारदजी ने उन्हें समझाया—
“राजन, जिस काष्ठ का समुद्र से आना स्वयं एक लीला थी, जिसे बल से उठाया नहीं जा सका, जिस पर सामान्य शिल्पकार काम नहीं कर सके और जिस वृद्ध शिल्पकार का कोई पता ही नहीं चला—उस भगवान का स्वरूप तुम्हारी अधीरता से कैसे निर्धारित हो सकता है?”
राजा ने नारदजी की ओर देखा।
नारदजी बोले—
“यही वह स्वरूप है जिसमें भगवान यहाँ विराजमान होना चाहते हैं।”
राजा धीरे-धीरे शांत हुए।
उन्होंने तीनों विग्रहों के सामने हाथ जोड़ दिए।
उनके हृदय में यह भाव जागा कि भगवान ने स्वयं अपने लिए ऐसा स्वरूप चुना है, जिसमें वे आने वाली पीढ़ियों तक भक्तों को दर्शन देंगे।
भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिष्ठा
अब प्रश्न उठा—
“इन दिव्य विग्रहों की प्रतिष्ठा कौन करेगा?”
नारदजी ने कहा—
“स्वयं ब्रह्माजी को आमंत्रित करना चाहिए।”
कथा-परंपरा के अनुसार, राजा इन्द्रद्युम्न नारदजी के साथ ब्रह्मलोक गए।
वहाँ पहुँचकर उन्होंने ब्रह्माजी को प्रणाम किया और निवेदन किया—
“पितामह! पुरुषोत्तम क्षेत्र में भगवान अद्भुत काष्ठ-विग्रह के रूप में प्रकट हुए हैं। कृपा करके उनकी प्रतिष्ठा के लिए चलिए।”
ब्रह्माजी ने राजा का निवेदन स्वीकार किया और पुरुषोत्तम क्षेत्र आए।
मंदिर में उत्सव का वातावरण था।
वेद-मंत्रों की ध्वनि गूँज रही थी। पवित्र जल, पुष्प, सुगंधित द्रव्य और वैदिक आचार्य उपस्थित थे।
विधिपूर्वक अनुष्ठान प्रारंभ हुआ।
भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और माता सुभद्रा के दिव्य स्वरूपों की प्रतिष्ठा संपन्न हुई।
राजा इन्द्रद्युम्न की आँखें भर आईं।
जिस भगवान को वे नीलमाधव के रूप में खोजते-खोजते घने वन तक पहुँचे थे, वही प्रभु अब उनके सामने एक नए, अद्भुत और अप्रतिम स्वरूप में विराजमान थे।
राजा ने हाथ जोड़कर कहा—
“प्रभो! मैं आपको खोजने निकला था, लेकिन अंत में आपने स्वयं अपना स्वरूप प्रकट किया।”
क्यों कहलाए भगवान “जगन्नाथ”?
कथा के अनुसार, भगवान का यह दिव्य स्वरूप केवल किसी एक राजा, किसी एक परिवार या किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं रहा।
वे कहलाए—
जगन्नाथ।
अर्थात—
संपूर्ण जगत के नाथ।
भगवान जगन्नाथ की कथा हमें यह संदेश देती है कि भगवान को पाने का मार्ग केवल बाहरी वैभव से नहीं, बल्कि सच्ची भक्ति, श्रद्धा, धैर्य और समर्पण से होकर जाता है।
राजा इन्द्रद्युम्न ने भगवान को खोजने का प्रयास किया, लेकिन अंततः भगवान ने स्वयं अपने भक्त के सामने अपना स्वरूप प्रकट किया।
यह कथा हमें यह भी सिखाती है कि कई बार हमारी इच्छा के अनुसार भगवान का उत्तर नहीं मिलता, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि भगवान हमारी प्रार्थना सुन नहीं रहे। संभव है कि वे हमारे लिए किसी ऐसी लीला की तैयारी कर रहे हों, जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते।
और शायद इसी भाव में “जगन्नाथ” नाम की सबसे सुंदर अनुभूति छिपी है—
जो पूरे जगत का नाथ है, वह किसी एक का नहीं, सबका है।
बोलिए प्रेम से—
श्री जगन्नाथ भगवान की जय!
श्री बलभद्र महाराज की जय!
माता सुभद्रा की जय!
