नवरात्रि के दिनों में देवी की आराधना अनेक परंपराओं के अनुसार की जाती है। कहीं नारियल और मिठाई का भोग लगाया जाता है, तो कहीं दीप जलाकर माँ से सुख-समृद्धि की प्रार्थना की जाती है। लेकिन राजस्थान के ओसियाँ नगर से जुड़ी एक प्रसिद्ध जैन लोककथा बताती है कि किस प्रकार अहिंसा और करुणा का संदेश एक देवी की पूजा-परंपरा से जुड़ गया।
कथा के अनुसार, एक जैन आचार्य ने पशुबलि की परंपरा पर प्रश्न उठाया। उनका कहना था कि यदि देवी जगत की जननी हैं, तो किसी जीव की हत्या को उनकी प्रसन्नता का साधन कैसे माना जा सकता है?
यह कथा है आचार्य रत्नप्रभ सूरि और सच्चियाय माता की, जिन्हें ओसियाँ की आराध्य देवी तथा अनेक ओसवाल जैन परिवारों की कुलदेवी के रूप में श्रद्धा से पूजा जाता है।
आइए, जानते हैं इस लोकप्रचलित कथा को और समझते हैं इसका अहिंसा तथा जीवों के प्रति करुणा से जुड़ा संदेश।
ओसियाँ की चामुंडा देवी और पशुबलि की परंपरा
राजस्थान के जोधपुर के निकट स्थित ओसियाँ अपने प्राचीन मंदिरों और ऐतिहासिक धार्मिक विरासत के लिए प्रसिद्ध है। जैन परंपरा से जुड़ी कथाओं में इस नगर का प्राचीन नाम उपकेशपुर बताया जाता है।
लोकप्रचलित जैन कथा के अनुसार, यहाँ चामुंडा देवी का एक प्रसिद्ध मंदिर था। नवरात्रि के अवसर पर देवी को प्रसन्न करने के लिए पशुबलि दिए जाने की परंपरा प्रचलित थी। उस समय अनेक लोग इसे धार्मिक अनुष्ठान का हिस्सा मानते थे।
इसी दौरान जैन आचार्य रत्नप्रभ सूरि अपने शिष्यों के साथ इस क्षेत्र में पहुँचे। जैन धर्म में अहिंसा को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। आचार्य के लिए प्रत्येक जीव का जीवन मूल्यवान था और किसी जीव को कष्ट पहुँचाना उनकी शिक्षाओं के विरुद्ध था।
जब उन्हें मंदिर में पशुबलि की परंपरा के बारे में पता चला, तो उन्होंने इस प्रथा पर प्रश्न उठाया।
आचार्य रत्नप्रभ सूरि ने पशुबलि का विरोध क्यों किया?
कथा के अनुसार, आचार्य रत्नप्रभ सूरि ने लोगों को समझाया कि किसी जीव की हत्या को देवी की भक्ति का अनिवार्य हिस्सा नहीं माना जाना चाहिए।
उन्होंने करुणा और अहिंसा की भावना पर बल दिया। उनके विचार में यदि देवी को जगत की माता माना जाता है, तो हर जीव के प्रति दया और संवेदना रखना भी आवश्यक है।
लोगों के मन में यह आशंका थी कि यदि पशुबलि बंद कर दी गई, तो देवी अप्रसन्न हो सकती हैं। इस कारण आचार्य की बात स्वीकार करना उनके लिए आसान नहीं था।
आचार्य ने लोगों को भय के बजाय विवेक और करुणा के आधार पर परंपराओं पर विचार करने की प्रेरणा दी।
यह प्रसंग हमें बताता है कि किसी पुरानी प्रथा पर प्रश्न उठाना उसका अपमान करना नहीं है। यदि किसी परंपरा से किसी जीव को पीड़ा पहुँचती है, तो उसके स्वरूप पर विचार करना भी धर्म और नैतिकता की चर्चा का हिस्सा हो सकता है।
चामुंडा देवी और आचार्य के संवाद की लोककथा
सच्चियाय माता से जुड़ी जैन लोकपरंपरा में आचार्य रत्नप्रभ सूरि और देवी चामुंडा के बीच एक विशेष प्रसंग सुनाया जाता है।
कथा के एक प्रचलित रूप के अनुसार, देवी आचार्य के पशुबलि-विरोध से अप्रसन्न हुईं और उन्हें कष्ट देने का प्रयास किया। आचार्य ने इस परिस्थिति में भी धैर्य बनाए रखा और अहिंसा के अपने सिद्धांत से पीछे नहीं हटे।
आगे चलकर देवी और आचार्य के बीच संवाद हुआ। आचार्य ने देवी को समझाया कि यदि भक्त उनके नाम पर जीवों की हत्या करते हैं, तो उस हिंसा के लिए देवी को प्रसन्न करने का दावा करना उचित नहीं है।
उन्होंने करुणा और अहिंसा के महत्व पर बल दिया। इस कथा में देवी के परिवर्तन को इस बात के प्रतीक के रूप में देखा जाता है कि धर्म की भावना को हिंसा के बजाय दया और सद्भाव से जोड़ा जाना चाहिए।
जैन लोकपरंपरा के अनुसार, इसके बाद देवी ने पशुबलि स्वीकार न करने की बात मानी और पूजा में अहिंसक भेंटों को महत्व दिया। कुछ प्रचलित विवरणों में लापसी, प्रसाद, केसर, चंदन और धूप का उल्लेख मिलता है।
इस प्रसंग के साथ चामुंडा देवी का नाम सच्चियाय माता या सच्चिया माता के रूप में प्रसिद्ध होने की कथा भी जुड़ी हुई है।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह विवरण जैन धार्मिक परंपरा में प्रचलित लोककथा का हिस्सा है। अलग-अलग विवरणों में घटना के कुछ प्रसंग और संवाद अलग मिलते हैं।
सच्चियाय माता और ओसवाल जैन समुदाय का संबंध
ओसियाँ का सच्चियाय माता मंदिर राजस्थान की महत्वपूर्ण धार्मिक धरोहरों में से एक है। यह मंदिर हिंदू और जैन परंपराओं के ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक संबंधों को समझने के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
जैन परंपरा में सच्चियाय माता को अहिंसा के मार्ग से जुड़ी देवी और ओसवाल जैन समुदाय की संरक्षक देवी के रूप में सम्मान दिया जाता है। अनेक ओसवाल परिवार उन्हें अपनी कुलदेवी मानते हैं और दर्शन के लिए ओसियाँ जाते हैं।
आचार्य रत्नप्रभ सूरि से जुड़ी कथाओं में ओसवाल समुदाय के उद्भव और क्षेत्र में जैन धर्म के प्रसार का वर्णन भी मिलता है। हालांकि, समुदाय की उत्पत्ति के विवरण विभिन्न परंपराओं और ऐतिहासिक अध्ययनों में अलग-अलग मिलते हैं। इसलिए इन कथाओं को धार्मिक-सामुदायिक परंपरा के संदर्भ में समझना उचित है, न कि प्रत्येक घटना को निर्विवाद ऐतिहासिक तथ्य मान लेना।
आज भी ओसियाँ अपने प्राचीन मंदिरों, धार्मिक यात्राओं और सांस्कृतिक विरासत के कारण श्रद्धालुओं तथा इतिहास में रुचि रखने वाले लोगों को आकर्षित करता है।
सच्चियाय माता की कथा से मिलने वाली तीन सीख
1. परंपरा के साथ करुणा और विवेक भी आवश्यक हैं
आचार्य रत्नप्रभ सूरि की कथा हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करती है कि किसी प्रथा का पालन करते समय उसके नैतिक पक्ष पर भी विचार करना चाहिए।
परंपराओं का सम्मान करते हुए भी हम यह प्रश्न पूछ सकते हैं कि क्या उनसे किसी जीव को अनावश्यक पीड़ा पहुँचती है। करुणा और विवेक के साथ किया गया संवाद सकारात्मक बदलाव का मार्ग खोल सकता है।
2. अहिंसा केवल विचार नहीं, जीवन जीने का तरीका है
अहिंसा का अर्थ केवल किसी जीव को नुकसान न पहुँचाना नहीं, बल्कि उसके प्रति संवेदनशील होना भी है।
पशु-पक्षियों के लिए पानी रखना, घायल जीवों की सहायता करना, भोजन व्यर्थ न करना और दूसरों के प्रति दयालु व्यवहार अपनाना—ये सभी करुणा को अपने जीवन में उतारने के तरीके हैं।
3. सच्ची भक्ति में सेवा और संवेदना का स्थान है
सच्चियाय माता की कथा का संदेश यह है कि धार्मिक श्रद्धा के साथ दूसरों के दुःख को समझने की भावना भी होनी चाहिए।
मंदिर में पूजा करना और जरूरतमंदों की सहायता करना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। हम अपनी आस्था के साथ सेवा, दया और जिम्मेदारी को भी जीवन का हिस्सा बना सकते हैं।
महानवमी पर करुणा और सेवा का संकल्प लें
नवरात्रि की महानवमी पर अनेक परिवार माँ को हलवा, पूड़ी, खीर, नारियल या अन्य प्रसाद अर्पित करते हैं। यह अवसर अपनी श्रद्धा व्यक्त करने के साथ-साथ दूसरों के प्रति दया और सेवा का भाव मजबूत करने का भी है।
हमारे आसपास ऐसे लोग हो सकते हैं जिन्हें भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं या दैनिक जीवन में सहयोग की आवश्यकता है। कुछ दिव्यांग बच्चों और उनके परिवारों को सुलभ सुविधाओं, सहायक उपकरणों या पढ़ाई में मदद की जरूरत हो सकती है।
इस महानवमी पर आप किसी जरूरतमंद परिवार तक भोजन पहुँचा सकते हैं, किसी विद्यार्थी की पढ़ाई में सहयोग कर सकते हैं, किसी दिव्यांग बच्चे के लिए आवश्यक सहायक उपकरण उपलब्ध कराने में मदद कर सकते हैं या किसी घायल पशु को उचित सहायता दिला सकते हैं।
ऐसा करते समय व्यक्ति की गरिमा, इच्छा और जरूरत का सम्मान करना जरूरी है। सेवा का उद्देश्य केवल सहायता देना नहीं, बल्कि किसी के जीवन को अधिक सुरक्षित, सहज और सम्मानजनक बनाने में योगदान देना भी है।
जब हमारी श्रद्धा करुणा और जिम्मेदारी में बदलती है, तब उसका प्रभाव पूजा के स्थान से आगे बढ़कर पूरे समाज तक पहुँचता है।
निष्कर्ष: सच्चियाय माता की कथा और अहिंसा का संदेश
आचार्य रत्नप्रभ सूरि और सच्चियाय माता की कथा राजस्थान की धार्मिक लोकपरंपरा से जुड़ा एक प्रेरक प्रसंग है। इसमें पशुबलि का विरोध, अहिंसा का महत्व और धार्मिक परंपराओं में करुणा के स्थान पर जोर दिया गया है।
ओसियाँ का सच्चियाय माता मंदिर आज भी इस क्षेत्र की महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का हिस्सा है। इस कथा को पढ़ते हुए हम अपने जीवन में यह संकल्प ले सकते हैं कि हमारी श्रद्धा के साथ दया, विवेक और सेवा की भावना भी जुड़ी रहे।
इस महानवमी पर माँ की आराधना करें और अपनी क्षमता के अनुसार किसी जरूरतमंद व्यक्ति या जीव की सहायता भी करें।
बोलिए, सच्चियाय माता की जय!
आचार्य रत्नप्रभ सूरि की जय!
ओसियाँ धाम की जय!
माँ की करुणा की जय!
