श्री राम जय राम जय जय राम।
ॐ हं हनुमते नमः।
एक विशाल सेना अयोध्या से निकली। उसके साथ हाथी, घोड़े, रथ और हजारों सैनिक थे। सेना गंगा नदी के तट की ओर बढ़ रही थी।
दूर से इस सेना को देखकर दो अलग-अलग स्थानों पर दो लोगों के मन में एक ही आशंका उठी। उन्हें लगा कि यह सेना भगवान श्रीराम पर आक्रमण करने आ रही है।
एक थे निषादराज गुह, जो श्रीराम के परम मित्र थे। दूसरे थे लक्ष्मण, जो अपने बड़े भाई की रक्षा के लिए हमेशा तत्पर रहते थे।
दोनों ने युद्ध की तैयारी कर ली। लेकिन उन्हें यह नहीं मालूम था कि उस विशाल सेना के आगे चल रहा राजकुमार भरत अपने भाई से युद्ध करने नहीं, बल्कि उन्हें वापस अयोध्या ले जाने आया था।
उसके मन में राज्य पाने की इच्छा नहीं, बल्कि अपने बड़े भाई के प्रति प्रेम, पश्चाताप और समर्पण था।
आइए, जानते हैं रामायण की इस भावपूर्ण कथा को, जिसमें निषादराज गुह, महर्षि भरद्वाज और लक्ष्मण के सामने भरत के चरित्र का एक अनोखा रूप प्रकट होता है।
भरत ने श्रीराम को वापस लाने का संकल्प लिया
जब भरत और शत्रुघ्न अपने ननिहाल से अयोध्या लौटे, तब उन्हें पता चला कि माता कैकेयी के वरदानों के कारण श्रीराम को चौदह वर्ष का वनवास मिला है और उनके पिता महाराज दशरथ का निधन हो चुका है।
यह समाचार सुनकर भरत अत्यंत दुखी हुए। उन्होंने माता कैकेयी के निर्णय का विरोध किया और स्पष्ट कर दिया कि वे उस राज्य को स्वीकार नहीं करेंगे, जिसके कारण उनके बड़े भाई को वन जाना पड़ा।
भरत ने निश्चय किया कि वे स्वयं वन में जाकर श्रीराम से मिलेंगे और उन्हें अयोध्या वापस लाने का प्रयास करेंगे।
वे अकेले नहीं गए। उनके साथ गुरु वसिष्ठ, माताएँ, मंत्री, पुरोहित, राजपरिवार के सदस्य, अयोध्या के नागरिक और चतुरंगिणी सेना भी थी।
हाथियों, घोड़ों, रथों और पैदल सैनिकों से सुसज्जित यह विशाल दल श्रीराम की खोज में वन की ओर चल पड़ा।
भरत के मन में केवल एक ही इच्छा थी—किसी भी तरह श्रीराम को अयोध्या वापस लाना।
निषादराज गुह ने भरत की सेना को देखकर युद्ध की तैयारी की
भरत की सेना यात्रा करते हुए गंगा नदी के तट पर स्थित श्रृंगवेरपुर पहुँची। इस नगर के राजा थे निषादराज गुह।
गुह भगवान श्रीराम के परम मित्र थे। वनवास के आरंभ में जब श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण गंगा के तट पर पहुँचे थे, तब गुह ने उनका प्रेमपूर्वक स्वागत किया था। उन्होंने उन्हें नदी पार कराने की व्यवस्था भी की थी।
एक दिन गुह को समाचार मिला कि अयोध्या से एक विशाल सेना उनके राज्य की ओर आ रही है।
उन्होंने दूर से सेना को देखा। हाथियों और घोड़ों की पंक्तियाँ, रथों पर लहराते ध्वज और आकाश तक उठती धूल देखकर वे चिंतित हो गए।
सेना के एक प्रमुख रथ पर अयोध्या का कोविदार वृक्ष वाला ध्वज दिखाई दे रहा था।
गुह ने तुरंत पहचान लिया कि यह भरत की सेना है।
उनके मन में आशंका हुई कि कहीं भरत राज्य को निष्कंटक बनाने के लिए श्रीराम को कोई हानि पहुँचाने तो नहीं आए हैं।
उन्होंने अपने निषाद योद्धाओं को आदेश दिया कि गंगा के तट पर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत कर दी जाए। पाँच सौ नावें तैयार रखने और प्रत्येक नाव में सौ युवकों को तैनात करने का निर्देश भी दिया।
गुह ने निश्चय किया कि पहले भरत के मन का उद्देश्य जानेंगे। यदि वे श्रीराम के प्रति सद्भाव रखते हैं, तो उन्हें नदी पार करने दिया जाएगा। लेकिन यदि उनका उद्देश्य श्रीराम को हानि पहुँचाना हुआ, तो निषादराज अपनी पूरी शक्ति से उनका सामना करेंगे।
भरत और निषादराज गुह की भावपूर्ण भेंट
गुह ने युद्ध की तैयारी करने के साथ-साथ अतिथि के रूप में भरत का स्वागत करने का भी निर्णय लिया।
वे फल, मूल और अन्य खाद्य पदार्थ लेकर भरत से मिलने पहुँचे।
जब भरत को पता चला कि निषादराज गुह उनसे मिलने आए हैं, तो उन्होंने उनका आदरपूर्वक स्वागत किया।
गुह ने भरत से उनके आने का उद्देश्य पूछा और श्रीराम के प्रति अपनी मित्रता तथा चिंता व्यक्त की।
भरत ने उन्हें समझाया कि वे श्रीराम को कोई हानि पहुँचाने नहीं आए हैं। उनका एकमात्र उद्देश्य अपने बड़े भाई को वापस अयोध्या ले जाना है।
भरत की बातें सुनकर गुह की आशंका दूर हो गई। उन्हें समझ आ गया कि भरत के मन में श्रीराम के प्रति कोई वैर नहीं है, बल्कि उनके लिए गहरा प्रेम और सम्मान है।
इसके बाद भरत ने गुह से पूछा कि वनवास के आरंभ में श्रीराम ने कहाँ विश्राम किया था।
गुह उन्हें उस स्थान पर ले गए, जहाँ श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण ने गंगा के किनारे रात्रि बिताई थी।
इंगुदी वृक्ष के नीचे श्रीराम की शय्या देखकर भरत हुए भावुक
गुह भरत को एक इंगुदी वृक्ष के पास ले गए। वहीं श्रीराम और माता सीता ने वनवास की पहली रात बिताई थी।
भरत ने वहाँ कुश घास से बनी शय्या देखी, जिस पर उनके प्रिय बड़े भाई ने विश्राम किया था।
उस स्थान पर कुश घास के निशान और कुछ सुनहरे कण भी दिखाई दे रहे थे। भरत ने अनुमान लगाया कि माता सीता के वस्त्र और आभूषणों से सोने के कण वहाँ चिपक गए होंगे।
यह दृश्य देखकर भरत का हृदय दुख से भर गया।
उन्होंने सोचा कि जो श्रीराम राजमहल में सुख-सुविधाओं के बीच रहते थे, उन्हें आज वन की धरती पर सोना पड़ रहा है।
भरत ने अपनी माताओं से कहा कि उनके बड़े भाई को ऐसी कठिन परिस्थितियों में रहना पड़ रहा है, जबकि उन्हें अयोध्या का राजसुख मिल सकता था।
उन्होंने संकल्प लिया कि जब तक श्रीराम वापस नहीं लौटेंगे, तब तक वे भी राजसी सुख-सुविधाओं का त्याग करके साधारण जीवन बिताएँगे।
भरत की यह पीड़ा उनके बड़े भाई के प्रति प्रेम और समर्पण को प्रकट करती है।
निषादराज गुह ने अपनी नावों से सेना को गंगा पार कराई
गुह अब भरत के उद्देश्य को समझ चुके थे।
जिस सेना को देखकर उन्होंने कुछ समय पहले युद्ध की तैयारी की थी, उसी सेना को अब उन्होंने अपनी नावों से गंगा पार कराने की व्यवस्था की।
पाँच सौ नावों सहित अनेक नाविक और निषाद योद्धा इस कार्य में जुट गए।
गुरु वसिष्ठ और राजपरिवार के सदस्यों के लिए विशेष नाव की व्यवस्था की गई। धीरे-धीरे पूरी सेना गंगा नदी पार करके आगे बढ़ी।
निषादराज गुह ने भरत और उनके साथ आए सभी लोगों का अतिथि के रूप में स्वागत किया और श्रीराम के बारे में आवश्यक जानकारी भी दी।
इस प्रकार एक गलत आशंका से शुरू हुई मुलाकात मित्रता, विश्वास और सहयोग में बदल गई।
महर्षि भरद्वाज ने भी भरत के उद्देश्य पर प्रश्न किया
गंगा पार करने के बाद भरत की सेना प्रयाग के निकट महर्षि भरद्वाज के आश्रम पहुँची।
महर्षि भरद्वाज एक महान तपस्वी थे। उन्होंने भरत और गुरु वसिष्ठ का सम्मानपूर्वक स्वागत किया।
लेकिन जब उन्होंने इतनी बड़ी सेना को वन की ओर आते देखा, तो उनके मन में भी एक प्रश्न उठा।
उन्होंने भरत से पूछा कि वे इतनी बड़ी सेना लेकर वन में किस उद्देश्य से आए हैं। क्या उनका इरादा श्रीराम और लक्ष्मण को कोई हानि पहुँचाने का तो नहीं है?
यह सुनकर भरत अत्यंत दुखी हो गए।
उन्होंने हाथ जोड़कर महर्षि से कहा कि वे श्रीराम को वापस अयोध्या ले जाने के लिए आए हैं। वे अपने बड़े भाई के चरणों में गिरकर उनसे वनवास छोड़ने की प्रार्थना करना चाहते हैं।
भरत ने अपनी माता के निर्णय से असहमति जताई और कहा कि वे कभी भी श्रीराम के विरुद्ध कोई कार्य नहीं कर सकते।
भरत की बातें सुनकर महर्षि भरद्वाज प्रसन्न हुए।
उन्होंने बताया कि वे भरत के मन का उद्देश्य जानते थे। उन्होंने यह प्रश्न इसलिए किया था, ताकि भरत की निष्ठा और निर्दोषता सबके सामने स्पष्ट हो सके।
इसके बाद महर्षि ने भरत और उनके साथ आए सभी लोगों को अपने आश्रम में रात्रि विश्राम करने का निमंत्रण दिया।
महर्षि भरद्वाज का अद्भुत अतिथि-सत्कार
भरत ने महर्षि से कहा कि उनके साथ बहुत बड़ी सेना है। आश्रम में सभी के ठहरने और भोजन की व्यवस्था करना कठिन होगा।
लेकिन महर्षि भरद्वाज ने उन्हें आश्वस्त किया कि वे अपने सभी अतिथियों का स्वागत करना चाहते हैं।
वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकांड में वर्णन मिलता है कि महर्षि ने अपने तपोबल से देवशिल्पी विश्वकर्मा और अन्य दिव्य शक्तियों का आवाहन किया।
कुछ ही समय में आश्रम का वातावरण अद्भुत रूप ले बैठा।
सेना के लिए भोजन, पेय पदार्थ और विश्राम की सुंदर व्यवस्था हुई। गंधर्वों के संगीत और अप्सराओं के नृत्य से वातावरण आनंदमय हो गया। अनेक प्रकार के स्वादिष्ट पकवान और सुख-सुविधाएँ अतिथियों के लिए उपलब्ध कराई गईं।
थकी हुई सेना के लिए यह अनुभव किसी स्वप्न से कम नहीं था।
सैनिकों ने महर्षि के अतिथि-सत्कार का आनंद लिया और उनकी उदारता से अभिभूत हो गए।
यह प्रसंग भारतीय परंपरा में अतिथि-सत्कार और तपस्या की शक्ति का सुंदर उदाहरण है।
चित्रकूट में लक्ष्मण ने भी भरत की सेना को शत्रु समझ लिया
अगले दिन भरत अपनी सेना के साथ चित्रकूट की ओर बढ़े, जहाँ श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण एक कुटिया में निवास कर रहे थे।
एक दिन जब श्रीराम और माता सीता चित्रकूट के प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद ले रहे थे, तभी अचानक वन में हलचल होने लगी।
पक्षी घबराकर उड़ने लगे और वन के पशु इधर-उधर भागने लगे। दूर से हाथियों, घोड़ों और सैनिकों की आवाजें सुनाई देने लगीं।
श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा कि वे जाकर पता लगाएँ कि इतनी हलचल किस कारण हो रही है।
लक्ष्मण एक ऊँचे वृक्ष पर चढ़े और दूर तक देखने लगे। उन्हें एक विशाल सेना दिखाई दी, जिसमें हाथी, घोड़े और रथ शामिल थे।
उन्होंने सेना के एक रथ पर अयोध्या का कोविदार ध्वज भी देखा।
लक्ष्मण को लगा कि भरत राज्य प्राप्त करने के बाद अब श्रीराम को भी रास्ते से हटाना चाहते हैं।
उनका क्रोध बढ़ गया। उन्होंने श्रीराम से कहा कि उन्हें तुरंत युद्ध की तैयारी कर लेनी चाहिए।
लक्ष्मण ने धनुष उठाया और भरत की सेना का सामना करने के लिए तैयार हो गए।
श्रीराम ने लक्ष्मण को समझाया और भरत पर विश्वास बनाए रखा
लक्ष्मण का क्रोध देखकर श्रीराम ने उन्हें शांत रहने के लिए कहा।
उन्होंने समझाया कि भरत ऐसा व्यक्ति नहीं है, जो अपने बड़े भाई को हानि पहुँचाए। वह तो सदैव उनके प्रति प्रेम और सम्मान रखता है।
श्रीराम ने कहा कि भरत के मन में राज्य का लोभ नहीं हो सकता। संभव है कि वह उन्हें वापस अयोध्या ले जाने के लिए आया हो।
उन्होंने लक्ष्मण को यह भी समझाया कि बिना पूरी बात जाने किसी अपने के बारे में गलत धारणा नहीं बनानी चाहिए।
श्रीराम की बातें सुनकर लक्ष्मण को अपनी भूल का एहसास हुआ। उनका क्रोध शांत हो गया और उन्होंने धनुष नीचे रख दिया।
कुछ समय बाद भरत श्रीराम की कुटिया के निकट पहुँचे। वे अपने बड़े भाई को देखते ही भावुक हो गए और उनके चरणों में गिर पड़े।
श्रीराम ने भरत को उठाकर गले लगा लिया। दोनों भाइयों के बीच प्रेम और भावनाओं का ऐसा मिलन हुआ, जिसे देखकर वहाँ उपस्थित सभी लोगों की आँखें नम हो गईं।
लक्ष्मण भी भरत से मिले और उनके प्रति अपने मन में उठी गलत आशंका पर लज्जित हुए।
इस प्रकार श्रीराम के प्रेम और विश्वास ने भाइयों के बीच किसी भी प्रकार की गलतफहमी को टिकने नहीं दिया।
भरत, गुह, भरद्वाज और लक्ष्मण की कथा से मिलने वाली चार सीख
रामायण के ये प्रसंग हमें केवल भाईचारे और भक्ति का संदेश नहीं देते, बल्कि हमारे रोजमर्रा के व्यवहार के लिए भी महत्वपूर्ण सीख देते हैं।
- किसी को केवल देखकर उसके बारे में निर्णय नहीं लेना चाहिए
निषादराज गुह और लक्ष्मण ने दूर से सेना को देखा और अपने मन में आशंका बना ली। लेकिन जब उन्हें भरत के वास्तविक उद्देश्य का पता चला, तो उनकी सोच बदल गई। हमें भी किसी व्यक्ति के कपड़ों, पद, आर्थिक स्थिति या उसके साथ मौजूद लोगों के आधार पर उसके चरित्र का निर्णय नहीं करना चाहिए।
- सच्चाई और अच्छा आचरण विश्वास पैदा करते हैं
भरत ने अपने व्यवहार और बातों से गुह तथा महर्षि भरद्वाज को अपनी निष्ठा का विश्वास दिलाया। उनका चरित्र बताता है कि सच्चाई और ईमानदारी समय के साथ स्वयं सामने आ जाती है।
- अतिथि का सम्मान करना हमारी संस्कृति का महत्वपूर्ण मूल्य है
महर्षि भरद्वाज ने अपनी सामर्थ्य और तपोबल से पूरी सेना के लिए भोजन तथा विश्राम की व्यवस्था की। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि अतिथि का स्वागत करना और अपनी सामर्थ्य के अनुसार दूसरों की आवश्यकता पूरी करना एक सुंदर मानवीय गुण है।
- गलतफहमी होने पर संवाद और विश्वास जरूरी हैं
लक्ष्मण ने सेना देखकर क्रोध में निर्णय ले लिया था, लेकिन श्रीराम ने उन्हें डाँटने के बजाय प्रेम से समझाया। यह हमें बताता है कि किसी अपने से भूल होने पर बातचीत, धैर्य और विश्वास से स्थिति को बेहतर बनाया जा सकता है।
इस दीपावली किसी अनजान व्यक्ति को समझने और उसकी सहायता करने का प्रयास करें
निषादराज गुह और लक्ष्मण की यह कथा हमें अपने आसपास के लोगों को एक नई दृष्टि से देखने की प्रेरणा देती है।
कई बार हम किसी व्यक्ति को उसके कपड़ों, आर्थिक स्थिति, शारीरिक बनावट या परिस्थितियों के आधार पर परख लेते हैं। किसी जरूरतमंद को देखकर हम बिना उसकी कहानी जाने उसके बारे में धारणा बना लेते हैं।
लेकिन हर व्यक्ति की अपनी एक कहानी होती है। हो सकता है कि जिस व्यक्ति को हम दूर से देखकर गलत समझ रहे हैं, उसे वास्तव में हमारी सहायता और सम्मान की आवश्यकता हो।
हमारे आसपास ऐसे अनेक दिव्यांगजन और जरूरतमंद परिवार हैं, जिन्हें शिक्षा, उपचार, पुनर्वास, कृत्रिम अंग, सहायक उपकरण और रोजगार के अवसरों की आवश्यकता होती है।
उनकी परिस्थितियों को समझना और उन्हें सही जानकारी तथा उचित सहयोग उपलब्ध कराना हम सभी की जिम्मेदारी है।
इस दीपावली एक छोटा-सा संकल्प लीजिए।
किसी जरूरतमंद व्यक्ति से सम्मानपूर्वक बात कीजिए। उसकी वास्तविक आवश्यकता समझिए और अपनी सामर्थ्य के अनुसार सहायता कीजिए। किसी भूखे व्यक्ति को भोजन कराइए और किसी जरूरतमंद परिवार को भी दीपावली की खुशियों में शामिल कीजिए।
क्योंकि सच्ची खुशी केवल अपने घर को रोशन करने में नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन में भी खुशियों का प्रकाश पहुँचाने में है।
जिस तरह निषादराज गुह ने अपनी शंका दूर होने के बाद भरत और उनकी सेना की सहायता की, उसी तरह हमें भी बिना जाने किसी के बारे में धारणा बनाने के बजाय उसे समझने का प्रयास करना चाहिए।
इस दीपावली प्रेम, विश्वास, सम्मान और सहयोग का दीप जलाएँ।
बोलिए—
निषादराज गुह की जय!
महर्षि भरद्वाज की जय!
भक्त भरत की जय!
लक्ष्मण जी की जय!
भगवान श्रीराम की जय!
श्री राम जय राम जय जय राम।
