दीपावली का पर्व केवल दीप जलाने और घर सजाने का अवसर नहीं है, बल्कि यह हमारी परंपराओं, प्रकृति और जीवन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का भी समय है। महाराष्ट्र में दीपावली के उत्सव की शुरुआत वसुबारस या गोवत्स द्वादशी से मानी जाती है। इस दिन गाय और उसके बछड़े की पूजा की जाती है। उन्हें स्नान कराया जाता है, तिलक लगाया जाता है और श्रद्धापूर्वक चारा तथा भोजन अर्पित किया जाता है।
भारतीय परंपरा में गाय को मातृत्व, पोषण और समृद्धि का प्रतीक माना गया है। विशेष रूप से कृषि-आधारित जीवन में गाय और अन्य पशुधन का परिवार तथा समाज के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रहा है।
लेकिन गौसेवा और समर्पण का यह भाव हमारी प्राचीन कथाओं में भी दिखाई देता है। ऐसी ही एक प्रेरक कथा महाकवि कालिदास के प्रसिद्ध महाकाव्य रघुवंशम् में मिलती है। यह कथा है अयोध्या के राजा दिलीप, उनकी पत्नी सुदक्षिणा और महर्षि वशिष्ठ की दिव्य गाय नंदिनी की।
यह वही राजा दिलीप थे, जिनके घर नंदिनी की कृपा से रघु का जन्म हुआ। आगे चलकर रघु के नाम से ही यह वंश रघुवंश कहलाया।
राजा दिलीप और रानी सुदक्षिणा की चिंता
प्राचीन समय में सूर्यवंश में राजा दिलीप का शासन था। वे धर्मपरायण, पराक्रमी और अपनी प्रजा के हित का ध्यान रखने वाले राजा थे। उनकी पत्नी का नाम सुदक्षिणा था। दोनों एक-दूसरे के प्रति समर्पित थे और राज्य में सुख-शांति थी।
लेकिन उनके जीवन में एक चिंता थी—उनकी कोई संतान नहीं थी।
समय बीतता गया, पर राजा और रानी को संतान-सुख प्राप्त नहीं हुआ। आखिरकार राजा दिलीप ने अपने कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ से इस समस्या का समाधान जानने का निश्चय किया।
वे रानी सुदक्षिणा के साथ उनके आश्रम पहुँचे। दोनों ने महर्षि के चरणों में प्रणाम किया और अपनी चिंता उनके सामने रखी।
राजा ने विनम्रता से पूछा, “गुरुदेव, मेरे जीवन में किस कारण संतान का सुख नहीं है? कृपया मुझे इसका कारण और उपाय बताइए।”
महर्षि वशिष्ठ ने अपनी दिव्य दृष्टि से इसका कारण जाना और राजा को एक पुरानी घटना याद दिलाई।
सुरभि के शाप का कारण
महर्षि वशिष्ठ ने बताया कि एक बार राजा दिलीप इंद्र से मिलने जा रहे थे। रास्ते में उन्हें दिव्य गाय सुरभि दिखाई दी, लेकिन वे उस समय अपनी पत्नी के पास लौटने की जल्दी में थे। इस कारण वे सुरभि का उचित अभिवादन नहीं कर पाए।
सुरभि ने इसे अपना अनादर समझा और राजा को संतान न होने का शाप दे दिया।
राजा दिलीप को इस घटना का स्मरण नहीं था। उन्होंने महर्षि से इस शाप से मुक्ति का उपाय पूछा।
तब वशिष्ठ ने बताया कि उनकी पुत्री नंदिनी आश्रम में रहती है। यदि राजा और रानी श्रद्धापूर्वक उसकी सेवा करेंगे, तो नंदिनी प्रसन्न होकर उन्हें संतान का आशीर्वाद दे सकती है।
राजा दिलीप और रानी सुदक्षिणा ने गुरु की आज्ञा स्वीकार की और उसी समय से नंदिनी की सेवा का संकल्प ले लिया।
राजा दिलीप और रानी सुदक्षिणा की नंदिनी-सेवा
अगली सुबह से राजा दिलीप की दिनचर्या बदल गई। उन्होंने राजसी सुख-सुविधाओं से दूर रहकर नंदिनी की सेवा आरंभ कर दी।
सुबह जब नंदिनी वन में चरने जाती, तो राजा उसके पीछे-पीछे चलते। वह जहाँ रुकती, राजा भी रुक जाते। वह जहाँ बैठती, राजा धैर्यपूर्वक उसके पास ठहरते। जब वह जल पीती, तो राजा भी जल ग्रहण करते।
वे उसके लिए हरी घास की व्यवस्था करते, शरीर पर खुजली होने पर उसे सहलाते और उसे परेशान करने वाले कीटों को दूर भगाते।
रानी सुदक्षिणा भी इस सेवा में सहभागी थीं। वे नंदिनी की पूजा करतीं, उसकी परिक्रमा करतीं और संध्या के समय आश्रम लौटने पर श्रद्धापूर्वक उसका स्वागत करतीं।
कालिदास के वर्णन में राजा दिलीप नंदिनी के पीछे उसी प्रकार चलते थे, जैसे उसकी छाया उसके साथ चलती है।
इस तरह एक दिन, दो दिन नहीं, बल्कि लगातार इक्कीस दिनों तक राजा और रानी ने पूरी निष्ठा से नंदिनी की सेवा की।
बाईसवें दिन सिंह ने किया नंदिनी पर आक्रमण
इक्कीस दिनों की सेवा पूरी होने के बाद एक दिन नंदिनी वन में चरते हुए हिमालय के एक सुंदर स्थान पर पहुँच गई। वहाँ एक देवदारु का वृक्ष था, जिसके आसपास हरी घास फैली हुई थी।
राजा दिलीप उसके पीछे चल रहे थे। कुछ क्षण के लिए उनका ध्यान पर्वत की सुंदरता की ओर चला गया।
उसी समय अचानक एक विशाल सिंह प्रकट हुआ और नंदिनी पर झपट पड़ा। उसने उसे अपने पंजों से दबा लिया।
नंदिनी की आवाज सुनते ही राजा दिलीप का ध्यान उसकी ओर गया। उन्होंने तुरंत अपने धनुष से बाण निकालकर सिंह पर चलाना चाहा, लेकिन उनका हाथ वहीं रुक गया। वे चाहकर भी अपना बाण नहीं चला सके।
तभी उस सिंह ने मनुष्य की आवाज में कहा, “राजन, व्यर्थ प्रयास मत कीजिए। मैं कोई साधारण सिंह नहीं हूँ। मेरा नाम कुंभोदर है और मैं भगवान शिव का सेवक हूँ।”
उसने बताया कि यह देवदारु का वृक्ष माता पार्वती को बहुत प्रिय है। उन्होंने इसे अपने पुत्र की तरह पाला है। भगवान शिव ने इस वृक्ष की रक्षा के लिए उसे यहाँ नियुक्त किया है।
यह सुनकर राजा दिलीप समझ गए कि उनके सामने कोई साधारण संकट नहीं है।
राजा दिलीप ने नंदिनी के लिए अपने प्राण अर्पित किए
सिंह ने राजा से कहा कि नंदिनी अब उसका आहार बनेगी और उन्हें उसे बचाने का प्रयास छोड़ देना चाहिए।
लेकिन राजा दिलीप ने स्पष्ट कहा कि नंदिनी महर्षि वशिष्ठ की गाय है और उसकी रक्षा का दायित्व उन्हें सौंपा गया है। यदि वे उसकी रक्षा नहीं कर पाए, तो अपने गुरु के सामने कैसे जाएँगे?
सिंह ने राजा को समझाया कि वे एक बड़े राज्य के शासक हैं। उनके जीवन पर उनकी प्रजा का भी अधिकार है। एक गाय के लिए अपने प्राण देना उचित नहीं है। यदि वे चाहें, तो महर्षि को दूसरी अनेक गायें दे सकते हैं।
लेकिन राजा दिलीप अपने निर्णय पर अडिग रहे।
उन्होंने कहा कि जो किसी की रक्षा का दायित्व स्वीकार करता है, उसे संकट के समय पीछे नहीं हटना चाहिए। क्षत्रिय का धर्म ही दूसरों को संकट से बचाना है। यदि वे अपनी शरण में आए हुए की रक्षा नहीं कर सकते, तो उनके राजा होने का क्या अर्थ है?
उन्होंने सिंह से कहा कि नंदिनी को छोड़कर उनके शरीर को अपना आहार बना ले।
यह कहकर राजा दिलीप ने अपने अस्त्र-शस्त्र नीचे रख दिए और स्वयं को सिंह के सामने अर्पित कर दिया।
नंदिनी ने राजा दिलीप की परीक्षा ली
राजा दिलीप मृत्यु का सामना करने के लिए तैयार थे। लेकिन तभी उनके ऊपर पुष्पों की वर्षा होने लगी।
उन्होंने आँखें खोलीं तो देखा कि वहाँ कोई सिंह नहीं था। नंदिनी उनके सामने सुरक्षित खड़ी थी।
तब नंदिनी ने बताया कि यह पूरी घटना उसकी माया से रची गई परीक्षा थी। वह देखना चाहती थी कि राजा अपने गुरु की गाय की रक्षा के लिए कितने समर्पित हैं।
राजा दिलीप की निष्ठा, सेवा और त्याग से प्रसन्न होकर नंदिनी ने उनसे वरदान माँगने को कहा।
राजा ने हाथ जोड़कर कहा, “देवी, मेरी एक ही इच्छा है। मुझे ऐसा पुत्र प्राप्त हो, जो मेरे वंश को आगे बढ़ाए और अपने अच्छे कर्मों से संसार में यश प्राप्त करे।”
नंदिनी ने उन्हें आशीर्वाद दिया और अपना दूध ग्रहण करने के लिए कहा।
लेकिन राजा दिलीप ने पहले अपने गुरु महर्षि वशिष्ठ की अनुमति लेना उचित समझा। उन्होंने नंदिनी के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए गुरु की आज्ञा के बिना दूध ग्रहण नहीं किया।
नंदिनी के आशीर्वाद से रघु का जन्म
संध्या के समय राजा दिलीप नंदिनी के साथ आश्रम लौटे और महर्षि वशिष्ठ को पूरी घटना बताई।
महर्षि ने राजा के समर्पण और नंदिनी की कृपा को जानकर उन्हें दूध ग्रहण करने की अनुमति दी।
इसके बाद राजा दिलीप ने नंदिनी का दूध ग्रहण किया। कालिदास के वर्णन के अनुसार, उन्होंने बछड़े के पीने के बाद बचा हुआ दूध महर्षि की अनुमति से पिया।
समय आने पर रानी सुदक्षिणा ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। उसका नाम रघु रखा गया।
यही रघु आगे चलकर महान पराक्रमी और दानवीर राजा बने। उनके नाम से ही यह वंश रघुवंश के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसी वंश में कई पीढ़ियों बाद राजा दशरथ के घर भगवान श्रीराम का जन्म हुआ।
इस प्रकार राजा दिलीप की नंदिनी-सेवा से जुड़ी यह कथा रघुवंश की एक महत्वपूर्ण प्रेरक घटना बन गई।
राजा दिलीप की कथा से क्या सीख मिलती है?
राजा दिलीप की कथा हमें बताती है कि सेवा केवल पूजा या सम्मान प्रकट करने तक सीमित नहीं होती। सच्ची सेवा में जिम्मेदारी निभाना, धैर्य रखना और जरूरत पड़ने पर त्याग के लिए तैयार रहना भी शामिल है।
राजा दिलीप एक बड़े राज्य के शासक थे, लेकिन नंदिनी की सेवा करते समय उन्होंने अपने पद और प्रतिष्ठा को बीच में नहीं आने दिया। वे उसके पीछे चलते, उसकी जरूरतों का ध्यान रखते और उसे किसी प्रकार की परेशानी न हो, इसका प्रयास करते थे।
इस कथा में एक और सुंदर संदेश दिखाई देता है—जिसकी सेवा करनी हो, उसकी आवश्यकता और सुविधा को प्राथमिकता देनी चाहिए।
इस गोवत्स द्वादशी पर सेवा का संकल्प लें
गोवत्स द्वादशी या वसुबारस पर गाय और बछड़े की पूजा करने की परंपरा हमें पशुओं के प्रति करुणा और कृतज्ञता का भाव सिखाती है।
इस अवसर पर हम राजा दिलीप की कथा से प्रेरणा लेकर अपने जीवन में भी सेवा का संकल्प ले सकते हैं।
हमारे आसपास कई ऐसे बच्चे, वृद्ध और दिव्यांगजन हैं, जिन्हें दूसरों के सहयोग, धैर्य और साथ की आवश्यकता होती है। कोई बच्चा अपनी गति से चलना सीख रहा हो सकता है, किसी वृद्ध को सहारे की जरूरत हो सकती है और कोई व्यक्ति उपचार या पुनर्वास की लंबी प्रक्रिया से गुजर रहा हो सकता है।
ऐसे लोगों की जरूरतों को समझना, उनकी गति का सम्मान करना और उन्हें आत्मनिर्भर बनने में सहयोग देना भी सेवा का महत्वपूर्ण रूप है।
इस अवसर पर किसी जरूरतमंद बच्चे की शिक्षा, उपचार, पुनर्वास या आवश्यक सहायक उपकरणों के लिए सहयोग करने का संकल्प लें। किसी वृद्ध के साथ समय बिताएँ और किसी ऐसे व्यक्ति की सहायता करें, जिसे आपके सहयोग की आवश्यकता है।
क्योंकि सेवा का अर्थ केवल किसी के लिए कुछ करना नहीं, बल्कि उसकी जरूरत को समझकर उसके साथ खड़े रहना भी है।
राजा दिलीप ने नंदिनी की सेवा करके यह संदेश दिया कि सच्चा सम्मान व्यवहार और जिम्मेदारी से प्रकट होता है।
इस गोवत्स द्वादशी पर गौसेवा के साथ मानवसेवा और करुणा का भाव भी अपने जीवन में अपनाएँ।
बोलिए—
राजा दिलीप की जय!
महारानी सुदक्षिणा की जय!
नंदिनी गौ माता की जय!
रघुवंश की जय!
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
