दीपावली पर लक्ष्मी जी के साथ क्यों होती है गणेश जी की पूजा? जानिए एक प्रचलित कथा

Published On November 5, 2026

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दीपावली की रात घर-घर में माता लक्ष्मी की पूजा होती है। लोग अपने घरों को दीपों से सजाते हैं, रंगोली बनाते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि दीपावली की पूजा में माता लक्ष्मी के साथ भगवान गणेश भी विराजमान होते हैं? इतना ही नहीं, कई परंपराओं में सबसे पहले गणेश जी का पूजन किया जाता है और उसके बाद माता लक्ष्मी की आराधना होती है।

आखिर धन और समृद्धि की देवी माता लक्ष्मी की पूजा में भगवान गणेश को इतना महत्व क्यों दिया जाता है?

गणेश जी को प्रथम पूज्य मानने की परंपरा तो हम सभी जानते हैं। लेकिन लक्ष्मी जी और गणेश जी के संबंध को समझाने वाली एक सुंदर लोककथा भी प्रचलित है। यह कथा माता लक्ष्मी की ममता, माता पार्वती के स्नेह और धन के साथ बुद्धि के महत्व को दर्शाती है।

आइए, जानते हैं माता लक्ष्मी और भगवान गणेश से जुड़ी यह भावपूर्ण कथा।

माता लक्ष्मी को क्यों कहा जाता है चंचला?

धार्मिक मान्यताओं में माता लक्ष्मी को धन, वैभव, सौभाग्य और समृद्धि की देवी माना गया है। उन्हें चंचला भी कहा जाता है। इसका भाव यह है कि धन और संपत्ति हमेशा एक स्थान पर नहीं टिकते। समय के साथ व्यक्ति की आर्थिक स्थिति बदलती रहती है। कभी किसी के पास अपार संपत्ति होती है, तो कभी उसे कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।

इसीलिए धन प्राप्त करने के साथ-साथ उसे सही तरीके से सँभालना भी जरूरी माना गया है। लोककथा के अनुसार, माता लक्ष्मी और भगवान गणेश का संबंध इसी गहरी सीख को समझाता है।

जब माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु के सामने व्यक्त की अपनी इच्छा

कहते हैं कि एक बार वैकुंठ में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के बीच बातचीत हो रही थी। माता लक्ष्मी अपनी कृपा और संसार में समृद्धि के महत्व का वर्णन कर रही थीं। उन्होंने कहा कि उनके आशीर्वाद से संसार में धन, वैभव और सुख-सुविधाएँ आती हैं।

भगवान विष्णु ने मुस्कुराते हुए उनकी बात सुनी। तभी माता लक्ष्मी के मन में एक इच्छा जागी। वे संसार के अनेक लोगों को सुख-समृद्धि देती थीं, लेकिन उनके मन में भी एक बच्चे के प्रति स्नेह और ममता व्यक्त करने की इच्छा थी।

इस विचार ने उन्हें भावुक कर दिया। उन्होंने सोचा कि संसार को वैभव देने के साथ-साथ वे भी किसी बच्चे को अपने स्नेह और ममता से भरपूर प्रेम देना चाहती हैं।

अपने मन की यह इच्छा लेकर माता लक्ष्मी कैलाश पर्वत पहुँचीं।

माता पार्वती से गणेश जी को पुत्र रूप में माँगने पहुँचीं लक्ष्मी जी

कैलाश पर माता पार्वती अपने दोनों पुत्रों—भगवान गणेश और भगवान कार्तिकेय के साथ थीं। दोनों को अपने पास देखकर माता लक्ष्मी के मन में वात्सल्य का भाव जाग उठा।

उन्होंने माता पार्वती को प्रणाम किया और अपनी इच्छा व्यक्त करते हुए कहा, “बहन, आपके दोनों पुत्र आपके जीवन की अनमोल खुशियाँ हैं। मेरे मन में भी किसी बच्चे को अपना स्नेह देने की इच्छा है। यदि आप अनुमति दें, तो मैं गणेश जी को अपने पुत्र के समान स्नेह और प्रेम देना चाहती हूँ।”

माता पार्वती ने उनकी बात सुनी, लेकिन वे कुछ सोच में पड़ गईं।

वे जानती थीं कि माता लक्ष्मी को चंचला कहा जाता है। धन और वैभव की देवी होने के कारण उनका संबंध संसार के अनेक स्थानों से है। ऐसे में माता पार्वती के मन में यह प्रश्न आया कि क्या लक्ष्मी जी गणेश जी को निरंतर अपना स्नेह और समय दे पाएँगी?

उन्होंने प्रेमपूर्वक कहा, “बहन, गणेश मेरा पुत्र है और मेरे हृदय के बहुत निकट है। मैं तुम्हारी भावना समझती हूँ, लेकिन तुम्हें चंचला भी कहा जाता है। यदि तुम एक स्थान पर अधिक समय तक नहीं ठहरतीं, तो गणेश की देखभाल और उसका स्नेह कैसे निभा पाओगी?”

माता लक्ष्मी ने माता पार्वती की बात को समझा। उन्होंने शांत स्वर में कहा, “बहन, तुम्हारी चिंता उचित है। मैं संसार में धन और वैभव का वितरण करती हूँ, लेकिन आज मुझे समझ आ रहा है कि जीवन में ठहराव, अपनापन और स्नेह का भी कितना महत्व है। मैं गणेश को केवल वैभव नहीं, बल्कि माँ का प्रेम देना चाहती हूँ।”

माता लक्ष्मी की भावना देखकर माता पार्वती का हृदय पिघल गया। उन्होंने भगवान गणेश को अपने पास बुलाया और उन्हें माता लक्ष्मी के स्नेह से जुड़ने की अनुमति दी।

इस प्रकार लोककथा में भगवान गणेश माता लक्ष्मी के पुत्रवत् माने जाने लगे।

माता लक्ष्मी और गणेश जी की पूजा का संबंध कैसे जुड़ा?

कथा के अनुसार, माता लक्ष्मी गणेश जी को अपने साथ पाकर अत्यंत प्रसन्न हुईं। उन्होंने उन्हें स्नेहपूर्वक अपने पास स्थान दिया और उनके प्रति अपने वात्सल्य को व्यक्त किया।

माता लक्ष्मी ने यह भाव प्रकट किया कि जहाँ गणेश जी का सम्मान होगा, जहाँ बुद्धि और विवेक को महत्व दिया जाएगा, वहाँ समृद्धि का भी आदर होगा।

इसी लोकमान्यता के आधार पर दीपावली की पूजा में माता लक्ष्मी के साथ भगवान गणेश को विराजमान करने की परंपरा को समझाया जाता है।

हालाँकि, गणेश जी की प्रथम पूजा का महत्व केवल इस लोककथा तक सीमित नहीं है। हिंदू धार्मिक परंपरा में उन्हें विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य माना जाता है। किसी भी शुभ कार्य का आरंभ उनसे प्रार्थना करके करने की परंपरा है।

धन के साथ बुद्धि और विवेक क्यों जरूरी हैं?

माता लक्ष्मी को धन और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, जबकि भगवान गणेश बुद्धि, विवेक और शुभारंभ के प्रतीक हैं।

इसका एक सुंदर जीवन संदेश है—केवल धन प्राप्त करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसका सही उपयोग करना भी जरूरी है।

यदि किसी व्यक्ति के पास बहुत धन है, लेकिन उसे सही निर्णय लेने की समझ नहीं है, तो वह अपनी संपत्ति का उचित उपयोग नहीं कर पाएगा। इसके विपरीत, बुद्धि और विवेक के साथ किया गया धन का उपयोग परिवार, समाज और जरूरतमंद लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकता है।

इसीलिए दीपावली पर लक्ष्मी जी के साथ गणेश जी की पूजा को धन और बुद्धि के संतुलन का प्रतीक भी माना जाता है।

बही-खाते की पूजा में क्यों लिखा जाता है शुभ-लाभ?

दीपावली के अवसर पर व्यापारी और व्यवसायी अपने नए बही-खातों की पूजा करते हैं। कई स्थानों पर इस परंपरा को चोपड़ा पूजन कहा जाता है।

इस दौरान बही-खातों पर स्वस्तिक बनाया जाता है और भगवान गणेश का स्मरण किया जाता है। इसके बाद शुभ और लाभ जैसे मंगलकारी शब्द लिखे जाते हैं।

इस परंपरा का संदेश है कि व्यापार और धन कमाने के हर कार्य की शुरुआत शुभ विचारों, ईमानदारी और सही निर्णयों के साथ होनी चाहिए।

धन तभी सार्थक है, जब उसका उपयोग उचित कार्यों, परिवार के कल्याण और समाज की भलाई के लिए किया जाए।

इस कथा से हमें क्या सीख मिलती है?

माता लक्ष्मी और भगवान गणेश से जुड़ी यह लोककथा हमें कई महत्वपूर्ण बातें समझाती है।

  1. धन के साथ विवेक भी जरूरी है: धन कमाना महत्वपूर्ण है, लेकिन उसे सही दिशा में खर्च करना और भविष्य के लिए सँभालना भी उतना ही आवश्यक है।
  2. स्नेह और अपनापन जीवन की बड़ी पूँजी हैं: किसी को प्रेम देना, उसका साथ निभाना और उसे अपनापन महसूस कराना किसी भी भौतिक संपत्ति से कम नहीं है।
  3. बुद्धि से ही समृद्धि का सही उपयोग होता है: गणेश जी का स्मरण हमें सिखाता है कि किसी भी कार्य की शुरुआत समझदारी और सकारात्मक सोच के साथ करनी चाहिए।
  4. समृद्धि का अर्थ केवल व्यक्तिगत सुख नहीं है: सच्ची समृद्धि तब सार्थक होती है, जब उसका लाभ परिवार के साथ-साथ समाज के जरूरतमंद लोगों तक भी पहुँचे।

इस दीपावली किसी जरूरतमंद बच्चे के जीवन में खुशियाँ लाएँ

दीपावली केवल दीप जलाने और घर सजाने का पर्व नहीं है। यह दूसरों के जीवन में भी खुशियों का उजाला फैलाने का अवसर है।

हमारे समाज में ऐसे अनेक बच्चे हैं जिन्हें बेहतर शिक्षा, उचित उपचार, पोषण और सहायक साधनों की आवश्यकता है। कुछ बच्चों को परिवार का सहारा नहीं मिल पाता, तो कुछ दिव्यांग बच्चों को आगे बढ़ने के लिए विशेष सहयोग और सुविधाओं की जरूरत होती है।

ऐसे बच्चों के जीवन में बदलाव लाने के लिए हम अपनी क्षमता के अनुसार योगदान दे सकते हैं। किसी बच्चे की शिक्षा में मदद करना, जरूरतमंद परिवार को उपचार के लिए सहयोग देना या किसी दिव्यांग बच्चे को आवश्यक सहायक उपकरण उपलब्ध कराने में योगदान देना—ये सभी नेक कार्य हैं।

इस दीपावली माता लक्ष्मी से केवल अपने घर में धन और वैभव की कामना न करें, बल्कि ऐसा हृदय भी माँगें जो दूसरों की जरूरत समझ सके और उनकी सहायता के लिए आगे बढ़े।

क्योंकि जब हमारी समृद्धि किसी जरूरतमंद के जीवन में आशा, सम्मान और आत्मनिर्भरता का कारण बनती है, तभी उसका वास्तविक महत्व सामने आता है।

इस दीपावली आइए, अपने घर के साथ किसी और के जीवन में भी खुशियों का दीप जलाएँ।

बोलिए—

लक्ष्मी माता की जय!
गणपति बप्पा मोरया!
माता पार्वती की जय!
दीपावली महापर्व की जय!

ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः।
ॐ गं गणपतये नमः।