भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और माता सुभद्रा पुरुषोत्तम क्षेत्र में प्रतिष्ठित हो चुके थे। मंदिर में नित्य पूजा, भोग, आरती और सेवा का क्रम प्रारंभ हो गया था।
समय बीतता गया।
भगवान के दर्शन के लिए दूर-दूर से भक्त आने लगे। कोई अपनी मनोकामना लेकर आता, कोई कृतज्ञता व्यक्त करने और कोई केवल भगवान के दर्शन से अपने जीवन को धन्य मानने।
लेकिन एक समय ऐसा आया जब भगवान ने केवल मंदिर में विराजमान रहकर भक्तों को दर्शन देने के बजाय स्वयं मंदिर से बाहर निकलकर भक्तों के बीच जाने की लीला की।
यहीं से भगवान जगन्नाथ की प्रसिद्ध रथयात्रा का प्रसंग जुड़ता है।
भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा क्या है?
जगन्नाथ रथयात्रा भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और माता सुभद्रा की भव्य यात्रा से जुड़ा प्रमुख उत्सव है। इस अवसर पर तीनों दिव्य विग्रह अपने-अपने विशाल रथों पर विराजमान होकर श्रीमंदिर से बाहर निकलते हैं।
कथा और परंपरा की दृष्टि से यह केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि ऐसी दिव्य लीला मानी जाती है जिसमें भगवान स्वयं अपने भक्तों के बीच आते हैं।
इसलिए रथयात्रा के समय वातावरण में एक अलग ही भाव दिखाई देता है।
चारों ओर जयकारे गूँजते हैं—
“जय जगन्नाथ!”
भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के तीन रथ
रथयात्रा के लिए भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और माता सुभद्रा के अलग-अलग रथ तैयार किए जाते हैं।
भगवान जगन्नाथ के रथ का नाम नन्दिघोष है।
भगवान बलभद्र के रथ को तालध्वज कहा जाता है।
माता सुभद्रा के रथ का नाम दर्पदलन, जिसे कुछ परंपराओं में देवदलन भी कहा जाता है।
इन रथों का निर्माण कोई सामान्य व्यवस्था नहीं मानी जाती।
हर वर्ष रथों के निर्माण की परंपरा के अनुसार लकड़ी लाई जाती है। शिल्पी अपने कौशल से रथ का ढाँचा तैयार करते हैं। पहिए बनाए जाते हैं। रथ को वस्त्रों से सजाया जाता है। ध्वज लगाए जाते हैं और अनेक पारंपरिक विधियों के बाद धीरे-धीरे वह दिन निकट आता है, जब भगवान मंदिर से बाहर निकलकर भक्तों को दर्शन देते हैं।
ऐसा लगता है मानो पूरी पुरी नगरी भगवान के स्वागत के लिए स्वयं सज रही हो।
स्नान पूर्णिमा के बाद भगवान का विश्राम
रथयात्रा से पहले भगवान जगन्नाथ से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण उत्सव आता है—स्नान पूर्णिमा।
इस दिन भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और माता सुभद्रा को विशेष स्नान कराया जाता है।
लोकप्रिय परंपरा में माना जाता है कि इस विशेष स्नान के बाद भगवान कुछ समय के लिए अस्वस्थ हो जाते हैं। इस अवधि में मंदिर के सामान्य दर्शन भी कुछ समय के लिए बंद रहते हैं।
भक्त प्रतीक्षा करते हैं।
उनके मन में भाव रहता है—
“भगवान विश्राम कर रहे हैं।”
कुछ दिनों के बाद भगवान नए श्रृंगार में भक्तों को दर्शन देते हैं। भक्तों की प्रतीक्षा समाप्त होती है और वातावरण फिर से भगवान के जयकारों से भर उठता है।
इसके बाद आता है वह महान अवसर—
भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा।
जब भगवान मंदिर से निकलकर भक्तों के बीच आते हैं
रथयात्रा के दिन पुरी की गलियाँ भक्तों से भर जाती हैं।
चारों ओर एक ही ध्वनि सुनाई देती है—
जय जगन्नाथ!
जय जगन्नाथ!
मंदिर से भगवान को रथ तक लाने की प्रक्रिया भी अत्यंत उत्सवपूर्ण होती है।
सेवक विशेष परंपराओं के अनुसार भगवान के विग्रहों को रथ तक लेकर आते हैं। भक्त इस दिव्य दृश्य को देखने के लिए उत्सुक रहते हैं।
भगवान बलभद्र अपने रथ पर विराजमान होते हैं।
माता सुभद्रा अपने रथ पर विराजती हैं।
और भगवान जगन्नाथ अपने विशाल नन्दिघोष रथ पर विराजमान होते हैं।
ऐसा लगता है जैसे भगवान स्वयं अपने भक्तों के बीच आने के लिए मंदिर से बाहर निकले हों।
छेरा पहँरा: जब राजा भगवान के सामने लगाते हैं झाड़ू
रथ चलने से पहले रथयात्रा की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रतीकात्मक परंपरा होती है—छेरा पहँरा।
पुरी के गजपति महाराज, जिन्हें परंपरा में भगवान के प्रमुख सेवक के रूप में सम्मान दिया जाता है, स्वयं राजसी अभिमान को छोड़कर भगवान के रथ के सामने आते हैं।
वे स्वर्ण-मुंडित झाड़ू से रथ के सामने मार्ग को साफ करते हैं।
सोचिए—
एक ओर वह राजा है, जिसे प्रजा प्रणाम करती है।
लेकिन भगवान के सामने वही राजा स्वयं सेवक बन जाता है।
यही इस परंपरा का सुंदर संदेश है—
भगवान के सामने पद, प्रतिष्ठा और राजसी वैभव का कोई अहंकार नहीं रहता।
भगवान के सामने सभी समान हैं।
लाखों भक्त खींचते हैं भगवान का रथ
अब रथयात्रा का सबसे प्रतीक्षित क्षण आता है।
रथों में रस्सियाँ बाँधी जाती हैं।
हजारों-लाखों भक्त भगवान के रथ की रस्सी पकड़ने के लिए उत्सुक रहते हैं।
हर भक्त के मन में एक ही भावना होती है—
“काश! भगवान के रथ को एक बार अपने हाथों से खींचने का सौभाग्य मिल जाए।”
फिर जयकारा लगता है।
रस्सियाँ तनती हैं।
और विशाल रथ धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगता है।
पुरी की धरती गूँज उठती है।
कहीं कीर्तन हो रहा है।
कहीं शंख बज रहे हैं।
कहीं मृदंग की ध्वनि सुनाई दे रही है।
कहीं भक्त आँसू भरी आँखों से भगवान को निहार रहे हैं।
लोग घरों की छतों से दर्शन करते हैं और मार्ग के दोनों ओर श्रद्धालुओं की भीड़ दिखाई देती है।
ऐसा लगता है मानो पूरी नगरी एक ही नाम में डूब गई हो—
“जय जगन्नाथ!”
भगवान जगन्नाथ गुंडिचा मंदिर क्यों जाते हैं?
अब प्रश्न उठता है—
भगवान जगन्नाथ रथयात्रा में कहाँ जाते हैं?
रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और माता सुभद्रा गुंडिचा मंदिर की ओर जाते हैं।
लोकप्रिय परंपरा में गुंडिचा मंदिर को भगवान की मौसी का घर भी कहा जाता है। हालांकि इस संबंध में लोकपरंपराओं और धार्मिक वर्णनों में अलग-अलग रूप मिलते हैं।
भगवान वहाँ कुछ दिनों के लिए विराजमान रहते हैं।
भक्त वहाँ भी भगवान के दर्शन के लिए उमड़ पड़ते हैं।
इस प्रकार भगवान केवल अपने मंदिर में ही नहीं, बल्कि अपने भक्तों के बीच भी पहुँचते हैं।
भगवान के चले जाने पर माता लक्ष्मी का मान
जब भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ गुंडिचा मंदिर की ओर चले गए, तब श्रीमंदिर में एक अलग ही भाव जागा।
यह भाव था—माता लक्ष्मी का।
माता लक्ष्मी ने देखा—
भगवान चले गए।
बलभद्रजी को साथ ले गए।
सुभद्राजी को भी साथ ले गए।
लेकिन उन्हें साथ नहीं ले गए।
अब माता लक्ष्मी का मान जागा।
कुछ दिनों बाद एक विशेष दिन आता है—
हेरा पंचमी।
हेरा पंचमी की कथा
हेरा पंचमी के अवसर पर माता लक्ष्मी का प्रतिनिधि स्वरूप गुंडिचा मंदिर की ओर जाता है।
लोकपरंपरा में इस प्रसंग को भगवान जगन्नाथ से माता लक्ष्मी के मान और उनके बीच के प्रेमपूर्ण संवाद से जोड़ा जाता है।
भाव कुछ ऐसा है—
“आप हमें बताए बिना चले आए?”
जगन्नाथजी की इस लीला में एक बड़ा अपनापन दिखाई देता है।
यह केवल देवता और भक्त की कथा नहीं लगती।
मानो एक परिवार की लीला चल रही हो।
उधर भगवान गुंडिचा मंदिर में विराजमान हैं।
इधर माता लक्ष्मी रुष्ट हैं।
लोकपरंपरा में यह भी वर्णित है कि माता लक्ष्मी के सेवक भगवान के रथ के एक हिस्से को प्रतीकात्मक रूप से क्षति पहुँचाते हैं। इसके बाद माता लक्ष्मी वापस श्रीमंदिर लौट जाती हैं।
इस प्रसंग में भक्ति के साथ प्रेम, मान और पारिवारिक भावनाओं की सुंदर झलक दिखाई देती है।
बहुदा यात्रा: भगवान की श्रीमंदिर वापसी
कुछ दिनों के बाद भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और माता सुभद्रा की वापसी की तैयारी होती है।
इस वापसी यात्रा को बहुदा यात्रा कहा जाता है।
अब वही तीनों रथ फिर से श्रीमंदिर की ओर चल पड़ते हैं।
भक्त फिर से भगवान के दर्शन के लिए मार्ग के दोनों ओर एकत्रित होते हैं।
जयकारों के बीच रथ आगे बढ़ते हैं।
लेकिन वापसी के दौरान भी भगवान की यात्रा में एक विशेष पड़ाव आता है।
वहाँ भगवान को विशेष भोग अर्पित किया जाता है और इसके बाद वे पुरी स्थित श्रीमंदिर की ओर आगे बढ़ते हैं।
भगवान जगन्नाथ और माता लक्ष्मी का मिलन
अब भगवान वापस श्रीमंदिर पहुँचते हैं।
लेकिन क्या माता लक्ष्मी तुरंत भगवान के लिए द्वार खोल देती हैं?
लोकप्रिय परंपरा के अनुसार—नहीं।
अब भगवान को माता लक्ष्मी को मनाना होता है।
परंपरा में आता है कि भगवान जगन्नाथ माता लक्ष्मी को मनाने के लिए विशेष भेंट और मिठाई अर्पित करते हैं।
इसी प्रसंग के साथ रसगुल्ले का उल्लेख भी लोकप्रिय लोकपरंपरा में प्रसिद्ध है।
भगवान माता लक्ष्मी को प्रसन्न करते हैं।
अंततः द्वार खुलता है।
भगवान जगन्नाथ फिर से श्रीमंदिर में प्रवेश करते हैं।
इस प्रकार रथयात्रा की यह अद्भुत लीला पूर्ण होती है।
लेकिन भगवान जगन्नाथ की कथाएँ केवल राजाओं, मंदिरों और भव्य उत्सवों तक सीमित नहीं हैं।
अब आती है एक ऐसी कथा, जिसमें न कोई राजा है और न राजमहल।
है तो केवल एक साधारण भक्त की असाधारण भक्ति।
उस भक्त का नाम था—
भक्त सालबेग।
भक्त सालबेग की अद्भुत भक्ति
भक्त सालबेग की कथा भगवान जगन्नाथ की भक्ति परंपरा में अत्यंत मार्मिक मानी जाती है।
कथा के लोकप्रिय रूप के अनुसार, सालबेग भगवान जगन्नाथ के अनन्य भक्त थे। वे भगवान के दर्शन के लिए अत्यंत व्याकुल रहते थे।
लेकिन परिस्थितियाँ ऐसी थीं कि वे श्रीमंदिर के भीतर जाकर भगवान के दर्शन नहीं कर सकते थे।
फिर भी उनकी भक्ति कम नहीं हुई।
वे दूर रहकर भी भगवान को अपने हृदय में बसाए रहे।
जब भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा का समय आया, तो उनके मन में भगवान के दर्शन की तीव्र इच्छा जागी।
कहा जाता है कि वे भगवान के रथ तक पहुँचना चाहते थे।
लेकिन क्या हुआ?
लोकप्रिय परंपरा के अनुसार—
भगवान जगन्नाथ का रथ भक्त सालबेग के लिए रुक गया।
भक्त की आँखों में आँसू आ गए।
उन्हें लगा जैसे भगवान स्वयं कह रहे हों—
“भक्त! मंदिर की दीवारें तुम्हें मेरे पास आने से रोक सकती हैं, लेकिन मेरी भक्ति के मार्ग में कोई दीवार नहीं है।”
यही भगवान जगन्नाथ की भक्ति की सबसे सुंदर विशेषता है।
भगवान के लिए भक्त की जाति, पद, धन या सामाजिक पहचान से अधिक महत्वपूर्ण उसका प्रेम और समर्पण माना जाता है।
भक्त सालबेग की कथा इसी भाव को जीवंत करती है।
भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा हमें क्या संदेश देती है?
जगन्नाथ रथयात्रा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि भक्ति और समानता का भी प्रतीक मानी जाती है।
जब भगवान स्वयं मंदिर से बाहर निकलकर भक्तों के बीच आते हैं, तो यह भाव प्रकट होता है कि भगवान केवल मंदिर की सीमाओं में नहीं हैं।
जब राजा स्वयं भगवान के सामने झाड़ू लगाता है, तो यह संदेश मिलता है कि भगवान के सामने अहंकार का कोई स्थान नहीं।
जब लाखों भक्त एक ही रस्सी पकड़कर भगवान का रथ खींचते हैं, तो यह दृश्य एकता और सामूहिक भक्ति की अनुभूति कराता है।
और जब भक्त सालबेग जैसे भक्त की कथा सामने आती है, तो यह विश्वास और गहरा हो जाता है कि सच्ची भक्ति दूरी और परिस्थितियों की सीमाओं से बड़ी होती है।
भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा मानो यही कहती है—
भगवान को पाने के लिए केवल मंदिर तक पहुँचना जरूरी नहीं, भगवान तक पहुँचने के लिए हृदय में सच्ची श्रद्धा होना जरूरी है।
जहाँ प्रेम है, वहाँ भगवान हैं।
जहाँ सेवा है, वहाँ भगवान हैं।
और जहाँ सच्ची भक्ति है, वहाँ भगवान स्वयं अपने भक्त तक पहुँचने का मार्ग बना लेते हैं।
बोलिए प्रेम से—
श्री जगन्नाथ भगवान की जय!
श्री बलभद्र महाराज की जय!
माता सुभद्रा की जय!
जय जगन्नाथ!
