जलझूलनी एकादशी क्यों मनाई जाती है? परिवर्तिनी एकादशी, वामन अवतार और जलझूलनी की कथा

Published On September 23, 2026

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भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को अलग-अलग क्षेत्रों में कई नामों से जाना जाता है।

कोई इसे परिवर्तिनी एकादशी कहता है, कोई पद्मा एकादशी, कोई वामन एकादशी या पार्श्व एकादशी। वहीं राजस्थान में यह पर्व श्रद्धा और उत्साह के साथ जलझूलनी एकादशी के रूप में मनाया जाता है। मध्य भारत के कई क्षेत्रों में इसे डोल ग्यारस भी कहा जाता है।

एक ही तिथि के इतने नाम क्यों हैं?

क्योंकि इस पावन दिन से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं और लोकपरंपराओं में भगवान विष्णु की करवट, वामन अवतार, राजा बलि का समर्पण और बाल कृष्ण की जल यात्रा जैसी कई कथाएँ मिलती हैं।

एक कथा क्षीरसागर से जुड़ी है, दूसरी पाताल लोक से और तीसरी ब्रज की गलियों से।

इन सभी कथाओं को समझने के बाद जलझूलनी एकादशी के नाम और महत्व का आध्यात्मिक अर्थ और भी सुंदर हो जाता है।

परिवर्तिनी एकादशी को भगवान विष्णु क्यों बदलते हैं करवट?

पौराणिक मान्यता के अनुसार, आषाढ़ मास की देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु चातुर्मास के दौरान योगनिद्रा में चले जाते हैं।

मान्यता है कि वे क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर विश्राम करते हैं। भाद्रपद शुक्ल एकादशी के दिन भगवान विष्णु करवट बदलते हैं।

इसी कारण इस एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है। कुछ परंपराओं में इसे पार्श्व एकादशी भी कहा जाता है। ‘पार्श्व’ और ‘परिवर्तन’ दोनों शब्द करवट बदलने या दिशा बदलने के भाव से जुड़े हैं।

भक्तों के लिए यह दिन केवल भगवान के विश्राम और करवट बदलने का प्रतीक नहीं है, बल्कि आत्मचिंतन और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का अवसर भी माना जाता है।

युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा एकादशी का महत्व

महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था। धर्मराज युधिष्ठिर हस्तिनापुर के राजा बन चुके थे।

वे अक्सर भगवान श्रीकृष्ण से धर्म, भक्ति और जीवन के गूढ़ रहस्यों के विषय में प्रश्न किया करते थे।

एक दिन युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से हाथ जोड़कर पूछा—

“हे केशव! भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? इसका क्या महत्व है और इस दिन किसकी पूजा करनी चाहिए?”

भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराए और बोले—

“हे धर्मराज! यह एकादशी अत्यंत पवित्र मानी जाती है। इसे परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है, क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु के करवट बदलने की धार्मिक मान्यता है।”

इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने इस तिथि से जुड़ी राजा बलि और वामन अवतार की कथा सुनाई।

राजा बलि और भगवान वामन की कथा

त्रेता युग में राजा बलि नाम का एक पराक्रमी असुर राजा हुआ करता था।

वह प्रह्लाद का पौत्र था। असुर कुल में जन्म लेने के बावजूद राजा बलि दान, तपस्या और वचन पालन के लिए प्रसिद्ध था। उसके द्वार से कोई याचक खाली हाथ नहीं लौटता था।

अपने पराक्रम, तप और यज्ञों के प्रभाव से उसने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। देवताओं का स्वर्गलोक भी उसके अधीन हो गया।

देवताओं ने भगवान विष्णु से सहायता की प्रार्थना की।

तब भगवान विष्णु ने एक छोटे से ब्राह्मण बालक का रूप धारण किया। यही रूप आगे चलकर वामन अवतार के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

भगवान वामन राजा बलि के यज्ञ में पहुँचे और उनसे केवल तीन पग भूमि का दान माँगा।

राजा बलि ने उनकी मांग स्वीकार कर ली।

लेकिन जैसे ही वामन भगवान ने विराट रूप धारण किया, उनके दो पगों में पृथ्वी और आकाश समा गए।

अब तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान शेष नहीं बचा।

राजा बलि समझ गए कि उनके सामने स्वयं भगवान विष्णु खड़े हैं। उन्होंने अपना सिर आगे कर दिया और कहा—

“प्रभु, तीसरा पग मेरे सिर पर रख दीजिए।”

राजा बलि ने अपना राज्य, वैभव और अंततः अपना अहंकार भी भगवान को समर्पित कर दिया।

उनके इस समर्पण से भगवान अत्यंत प्रसन्न हुए।

भगवान विष्णु ने राजा बलि को क्या वचन दिया?

पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने राजा बलि से कहा—

“माँगो, तुम्हें क्या चाहिए?”

राजा बलि ने उत्तर दिया—

“प्रभु, मुझे धन, राज्य या वैभव कुछ नहीं चाहिए। मेरी इच्छा केवल इतनी है कि आप मेरे पास रहें।”

राजा बलि की भक्ति और समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें वचन दिया कि वे चातुर्मास के दौरान उनके लोक में भी निवास करेंगे।

इसी धार्मिक मान्यता के कारण परिवर्तिनी एकादशी का संबंध भगवान विष्णु, वामन अवतार और राजा बलि से जोड़ा जाता है।

इस दिन भगवान वामन की पूजा, व्रत, दान और भक्ति का विशेष महत्व माना जाता है।

इसे पद्मा और वामन एकादशी क्यों कहते हैं?

परिवर्तिनी एकादशी को कई परंपराओं में पद्मा एकादशी और वामन एकादशी भी कहा जाता है।

‘पद्म’ का अर्थ कमल है। कमल भगवान विष्णु से जुड़ा पवित्र प्रतीक माना जाता है। इसलिए इस तिथि को पद्मा एकादशी कहने की परंपरा भी मिलती है।

वहीं वामन अवतार से जुड़े धार्मिक प्रसंगों के कारण इसे वामन एकादशी कहा जाता है।

इस दिन भगवान विष्णु की पूजा में कमल, तुलसी, पीले पुष्प, फल और श्रद्धापूर्वक अर्पित किए गए नैवेद्य का महत्व माना जाता है।

लेकिन जलझूलनी एकादशी नाम कहाँ से आया?

अब प्रश्न उठता है—

यदि यह दिन भगवान विष्णु की करवट और वामन अवतार से जुड़ा है, तो इसमें जल और झूले का संबंध कैसे आया?

इसका उत्तर केवल पौराणिक कथा में नहीं, बल्कि ब्रज और विभिन्न क्षेत्रों की लोकपरंपराओं में भी मिलता है।

एक लोकप्रिय लोकमान्यता इसे माता यशोदा और बाल कृष्ण से जोड़ती है।

माता यशोदा और बाल कृष्ण की जल यात्रा

लोकपरंपरा के अनुसार, जब श्रीकृष्ण का जन्म हुआ, तब कंस के भय के कारण उनके जन्म और पालन-पोषण को अत्यंत गुप्त रखा गया।

गोकुल में माता यशोदा अपने लाला की सुरक्षा को लेकर हमेशा चिंतित रहती थीं।

कथा में कहा जाता है कि बाल कृष्ण को लंबे समय तक घर के भीतर ही रखा गया। उनके जन्म के बाद कई धार्मिक और पारिवारिक संस्कार भी परिस्थितियों के कारण सीमित रूप में हुए।

फिर भाद्रपद शुक्ल एकादशी के दिन माता यशोदा ने अपने भय को पीछे छोड़कर बाल कृष्ण को घर से बाहर निकाला।

उन्होंने लाला को स्नान कराया, नए वस्त्र पहनाए और पहली बार उन्हें जल के समीप ले गईं।

कहा जाता है कि उन्होंने बाल कृष्ण को यमुना के तट पर ले जाकर जल से परिचित कराया और प्रेमपूर्वक अपनी गोद में झुलाया।

उस दिन गोकुल में आनंद और उत्सव का वातावरण बन गया।

इसी लोकमान्यता से जल में झुलाने और भगवान को जल के समीप ले जाने की परंपरा को जलझूलनी नाम से जोड़ा जाता है।

डोल ग्यारस और जलझूलनी एकादशी

मध्य प्रदेश और आसपास के कई क्षेत्रों में जलझूलनी एकादशी को डोल ग्यारस भी कहा जाता है।

इस दिन भगवान के बाल स्वरूप या ठाकुरजी की प्रतिमा को सुंदर डोल, पालकी या झाँकी में विराजमान किया जाता है।

भक्त भजन-कीर्तन करते हुए भगवान को जलाशय, नदी, कुंड या घाट तक ले जाते हैं। वहाँ पूजा, आरती और जल से जुड़े धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं।

कई स्थानों पर भगवान को झूला झुलाने और जल के दर्शन कराने की परंपरा भी निभाई जाती है।

इस प्रकार यह पर्व भगवान की भक्ति के साथ-साथ लोकसंस्कृति, सामूहिक उत्सव और क्षेत्रीय परंपराओं का भी प्रतीक बन गया है। citeturn945378search8turn945378search4

राजस्थान में जलझूलनी एकादशी का महत्व

राजस्थान में जलझूलनी एकादशी विशेष उत्साह के साथ मनाई जाती है।

उदयपुर में इस अवसर पर भगवान के स्वरूप को सुसज्जित पालकी या रामरेवाड़ी में विराजमान कर भक्त शोभायात्रा निकालते हैं।

कई धार्मिक यात्राएँ शहर के प्रमुख मार्गों से होकर जलाशय और घाटों तक पहुँचती हैं। उदयपुर की परंपरा में गणगौर घाट और पिछोला झील से जुड़ी धार्मिक गतिविधियाँ विशेष आकर्षण का केंद्र रहती हैं।

भक्त भगवान को जल के समीप ले जाकर पूजा-अर्चना करते हैं और सामूहिक रूप से भजन-कीर्तन करते हैं।

यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत, लोकभक्ति और सामुदायिक सहभागिता का भी सुंदर उदाहरण है। citeturn945378search1turn945378search6

एक ही दिन में तीन कथाएँ कैसे जुड़ती हैं?

जलझूलनी एकादशी के आध्यात्मिक अर्थ को तीन प्रमुख प्रसंगों के माध्यम से समझा जा सकता है—

1. क्षीरसागर में भगवान की करवट

परिवर्तिनी एकादशी भगवान विष्णु के करवट बदलने की धार्मिक मान्यता से जुड़ी है।

यह जीवन में परिवर्तन, जागरूकता और नई दिशा का प्रतीक मानी जा सकती है।

2. पाताल लोक में राजा बलि से भगवान का वचन

राजा बलि ने अपना सब कुछ भगवान को समर्पित कर दिया था।

भगवान ने भी उनके समर्पण का सम्मान करते हुए उनके पास रहने का वचन दिया।

यह प्रसंग बताता है कि सच्ची भक्ति में भगवान और भक्त का संबंध प्रेम, विश्वास और वचन पर आधारित होता है।

3. ब्रज में माता यशोदा का वात्सल्य

लोकमान्यता में जलझूलनी का संबंध माता यशोदा द्वारा बाल कृष्ण को जल के समीप ले जाने से जोड़ा जाता है।

यह प्रसंग मातृप्रेम, सुरक्षा, उत्सव और बाल कृष्ण के प्रति वात्सल्य का प्रतीक है।

जलझूलनी एकादशी हमें क्या संदेश देती है?

इन तीनों प्रसंगों में एक सुंदर भाव समान दिखाई देता है—

किसी की ओर प्रेम से मुड़ना।

भगवान विष्णु करवट बदलते हैं।

भगवान राजा बलि की ओर मुड़कर उनके पास रहने का वचन निभाते हैं।

माता यशोदा अपने भय से ऊपर उठकर बाल कृष्ण को संसार और प्रकृति के समीप ले जाती हैं।

यही जलझूलनी एकादशी का गहरा संदेश है।

कभी-कभी जीवन में हमें भी अपनी दिशा बदलनी पड़ती है।

अपने स्वार्थ से हटकर किसी जरूरतमंद की ओर देखना पड़ता है।

अपने भय से ऊपर उठकर किसी का सहारा बनना पड़ता है।

और अपने सुख से आगे बढ़कर किसी दूसरे के जीवन में प्रसन्नता लानी पड़ती है।