श्री राम जय राम जय जय राम।
ॐ हं हनुमते नमः।
अयोध्या की सड़कों पर एक रथ लौट रहा था। रथ में घोड़े वही थे, पहिए वही थे और सारथी भी वही था। लेकिन इस बार रथ में भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण नहीं थे। रथ खाली था।
रथ के घोड़े अपने स्वामी के वियोग में गर्म आँसू बहा रहे थे और आगे बढ़ने को तैयार नहीं थे। सारथी के मन में भी गहरा दुख था। वह अयोध्या लौट तो रहा था, लेकिन जानता था कि उसके आने की खबर सुनकर राजा दशरथ का हृदय और अधिक व्याकुल हो जाएगा।
वह सारथी कौन था, जिसने कभी राजा दशरथ को ऐसी सलाह दी थी जो राम के जन्म का मार्ग बनी और बाद में उसी ने राम के वनवास का समाचार राजा तक पहुँचाया?
उसका नाम था महामंत्री सुमंत्र।
रामायण में हम भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के महान चरित्रों के बारे में बहुत कुछ पढ़ते हैं। लेकिन सुमंत्र जैसे निष्ठावान मंत्री और सारथी का योगदान भी कम महत्वपूर्ण नहीं था। वे राजा दशरथ के विश्वासपात्र थे और राजपरिवार के अनेक महत्वपूर्ण प्रसंगों के साक्षी बने।
राजा दशरथ को पुत्र प्राप्ति की सलाह देने वाले सुमंत्र
अयोध्या के राजा दशरथ धर्मपरायण और प्रतापी शासक थे। उनके राज्य में सुख-समृद्धि थी, लेकिन उनके मन में एक बड़ी चिंता थी। उनके कोई पुत्र नहीं था, जो आगे चलकर सूर्यवंश की परंपरा और राजकाज का उत्तरदायित्व संभाल सके।
राजा दशरथ ने संतान प्राप्ति के लिए यज्ञ करने का निश्चय किया। उन्होंने अपने मंत्रियों और गुरुजनों से विचार-विमर्श किया। तभी उनके विश्वासपात्र मंत्री सुमंत्र ने उन्हें एक पुरानी कथा सुनाई।
वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड में वर्णन मिलता है कि सुमंत्र ने राजा को ऋष्यशृंग मुनि के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि ऋष्यशृंग महान तपस्वी हैं और उनके आगमन से राजा को पुत्र प्राप्ति का शुभ फल मिल सकता है।
सुमंत्र ने यह भी बताया कि ऋष्यशृंग के विषय में यह बात उन्होंने पहले ऋषियों से सुनी थी। उनकी सलाह सुनकर राजा दशरथ प्रसन्न हुए और ऋष्यशृंग को अयोध्या लाने की व्यवस्था की।
ऋष्यशृंग मुनि के मार्गदर्शन में राजा दशरथ ने पुत्रकामेष्टि यज्ञ संपन्न करवाया। यज्ञ के फलस्वरूप प्राप्त दिव्य खीर को राजा ने अपनी रानियों में बाँटा। समय आने पर माता कौशल्या, माता कैकेयी और माता सुमित्रा के यहाँ चार पुत्रों का जन्म हुआ—श्रीराम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न।
इस प्रकार सुमंत्र की सलाह ने राजा दशरथ को ऋष्यशृंग मुनि तक पहुँचने का मार्ग दिखाया। वे उस महत्वपूर्ण घटना के एक प्रमुख सलाहकार बने, जिसने अयोध्या के इतिहास को नई दिशा दी।
जब सुमंत्र बने श्रीराम के वनवास के सारथी
समय बीतता गया। अयोध्या में श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारियाँ होने लगीं। पूरी नगरी उत्सव के लिए सजाई जा रही थी। लेकिन परिस्थितियों ने अचानक ऐसा मोड़ लिया कि राज्याभिषेक के स्थान पर श्रीराम को चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार करना पड़ा।
राजा दशरथ अपने प्रिय पुत्र को रोकना चाहते थे, लेकिन श्रीराम ने पिता के वचन की मर्यादा निभाने का निश्चय कर लिया।
वन जाने के लिए श्रीराम के साथ माता सीता और लक्ष्मण भी तैयार हो गए। राजा दशरथ ने सुमंत्र को आदेश दिया कि वे तीनों को रथ से वन की ओर ले जाएँ।
सुमंत्र ने राजकीय रथ तैयार किया। श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण उसमें सवार हुए। अयोध्या के लोग भी अपने प्रिय राजकुमार को विदा करने के लिए रथ के पीछे चल पड़े। नगर में हर ओर शोक और व्याकुलता का वातावरण था।
सुमंत्र के लिए भी यह यात्रा आसान नहीं थी। जिन श्रीराम को उन्होंने राजमहल में राजकुमार के रूप में देखा था, आज उन्हीं को वन की ओर ले जाना उनके लिए अत्यंत पीड़ादायक था।
रथ अयोध्या से आगे बढ़ता हुआ तमसा नदी के तट तक पहुँचा। वहाँ श्रीराम ने रात्रि विश्राम किया। अगले दिन प्रजा को अपने पीछे आते देखकर श्रीराम ने ऐसा मार्ग अपनाने का विचार किया, जिससे लोग उन्हें खोजते हुए आगे न बढ़ें और अयोध्या लौट जाएँ।
इसके बाद यात्रा आगे बढ़ी और श्रीराम, सीता तथा लक्ष्मण श्रृंगवेरपुर पहुँचे। वहाँ निषादराज गुह ने उनका स्वागत किया।
गंगा तट पर सुमंत्र की विदाई
श्रृंगवेरपुर पहुँचने के बाद श्रीराम ने वन की आगे की यात्रा पैदल करने का निश्चय किया। अब सुमंत्र को अयोध्या लौटना था।
सुमंत्र के लिए यह निर्णय बहुत कठिन था। वे श्रीराम को छोड़कर वापस नहीं जाना चाहते थे। जिस राजकुमार की सेवा उन्होंने वर्षों तक की थी, उसी से अब उन्हें अलग होना पड़ रहा था।
लेकिन श्रीराम ने उन्हें समझाया कि उनका अयोध्या लौटना आवश्यक है। राजा दशरथ पहले ही पुत्र-वियोग से व्याकुल हैं। ऐसे समय में सुमंत्र का उनके पास रहना जरूरी है।
सुमंत्र को श्रीराम ने पिता के प्रति अपना प्रणाम और संदेश पहुँचाने का उत्तरदायित्व भी दिया। श्रीराम अपने पिता के वचन का पालन करते हुए वनवास पर जा रहे थे और उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि वे अपनी प्रतिज्ञा से पीछे नहीं हटेंगे।
अंततः सुमंत्र ने भारी मन से श्रीराम, सीता और लक्ष्मण को प्रणाम किया। तीनों आगे की यात्रा के लिए गंगा पार चले गए और सुमंत्र को अयोध्या लौटना पड़ा।
खाली रथ लेकर लौटे सुमंत्र के घोड़े भी रो पड़े
सुमंत्र जब अयोध्या की ओर लौट रहे थे, तब उनके मन में श्रीराम से बिछड़ने का दुख था। रथ में अब वे तीनों नहीं थे, जिनकी सेवा करना उनके लिए सम्मान की बात थी।
वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकाण्ड में सुमंत्र स्वयं राजा दशरथ को अपनी वापसी का वर्णन सुनाते हैं। वे बताते हैं कि श्रीराम के वन चले जाने के बाद जब वे लौटने लगे, तब उनके घोड़े गर्म आँसू बहा रहे थे और रास्ते पर आगे बढ़ना नहीं चाहते थे।
यह दृश्य केवल एक सारथी के दुख को नहीं दिखाता, बल्कि राम के प्रति पूरे अयोध्या के प्रेम और लगाव को भी प्रकट करता है।
सुमंत्र निषादराज गुह के साथ कुछ समय तक रुके रहे। उन्हें आशा थी कि शायद श्रीराम उन्हें फिर से बुला लें। लेकिन जब यह स्पष्ट हो गया कि श्रीराम अपनी वनयात्रा पर आगे बढ़ चुके हैं, तब वे रथ लेकर अयोध्या की ओर चल पड़े।
अयोध्या पहुँचने पर नगरवासियों ने खाली रथ देखा तो वे व्याकुल हो उठे। सबके मन में एक ही प्रश्न था—श्रीराम कहाँ हैं?
सुमंत्र के पास उस प्रश्न का उत्तर था, लेकिन उसे सुनाना उनके लिए भी आसान नहीं था।
राजा दशरथ को सुनाना पड़ा सबसे कठिन समाचार
सुमंत्र सीधे राजा दशरथ के पास पहुँचे। पुत्र-वियोग में व्याकुल राजा अपने प्रिय राम की प्रतीक्षा कर रहे थे।
सुमंत्र को देखकर राजा ने सबसे पहले यही पूछा कि राम कहाँ हैं और उनकी यात्रा कैसी रही।
सुमंत्र ने सिर झुकाकर उन्हें पूरी घटना सुनाई। उन्होंने बताया कि श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण गंगा पार करके आगे बढ़ चुके हैं। उन्होंने श्रीराम का संदेश भी राजा तक पहुँचाया कि वे अपने पिता के चरणों में प्रणाम करते हैं और वनवास के वचन का पूरी निष्ठा से पालन करेंगे।
यह समाचार सुनकर दशरथ का दुख और गहरा हो गया। वे अपने पुत्र को वापस देखना चाहते थे। उन्होंने सुमंत्र से राम के पास ले चलने की इच्छा भी व्यक्त की।
लेकिन अब श्रीराम अयोध्या से बहुत दूर जा चुके थे।
सुमंत्र के लिए यह केवल एक समाचार सुनाना नहीं था। वे जानते थे कि उनके शब्द राजा के हृदय को कितना आहत करेंगे। फिर भी उन्होंने अपना कर्तव्य निभाया और जो कुछ देखा-सुना था, वह सब राजा को बता दिया।
इसके बाद दशरथ का शोक लगातार बढ़ता गया। कौशल्या के साथ बातचीत के दौरान उन्होंने अपने जीवन की एक पुरानी घटना भी याद की, जिसमें अनजाने में उनके हाथों एक ऋषिपुत्र की मृत्यु हो गई थी। उस घटना से जुड़े श्राप की स्मृति और राम-वियोग का दुख उनके मन पर भारी पड़ गया।
अंततः राजा दशरथ ने पुत्र-वियोग में अपने प्राण त्याग दिए।
इस प्रकार सुमंत्र उस दुखद समय के साक्षी बने, जब अयोध्या ने अपने राजा को खो दिया।
सुमंत्र की कथा हमें क्या सिखाती है?
सुमंत्र का चरित्र हमें बताता है कि रामायण केवल राजाओं, राजकुमारों और युद्धों की कथा नहीं है। इसमें उन लोगों का योगदान भी महत्वपूर्ण है, जो पर्दे के पीछे रहकर अपना कर्तव्य निभाते हैं।
सुमंत्र ने राजा दशरथ को महत्वपूर्ण सलाह दी, श्रीराम को वन की ओर पहुँचाया और कठिन समय में राजा तक उनका संदेश पहुँचाया। उन्होंने अपने व्यक्तिगत दुख से ऊपर उठकर अपने कर्तव्य को निभाया।
उनकी कथा से हमें कुछ महत्वपूर्ण सीख मिलती हैं।
पहली सीख—सही समय पर दी गई सलाह बहुत महत्वपूर्ण होती है। सुमंत्र ने राजा दशरथ को ऋष्यशृंग मुनि के बारे में बताया। उनकी सलाह ने राजा को पुत्रकामेष्टि यज्ञ की दिशा में आगे बढ़ने में सहायता की।
दूसरी सीख—कर्तव्य कभी-कभी कठिन होता है। सुमंत्र के लिए श्रीराम को छोड़कर अयोध्या लौटना आसान नहीं था। फिर भी उन्होंने श्रीराम की आज्ञा और राजा के प्रति अपने दायित्व को महत्व दिया।
तीसरी सीख—सच्ची सेवा में सम्मान की अपेक्षा नहीं होती। सुमंत्र का महत्व केवल उनके पद से नहीं, बल्कि उनकी निष्ठा और जिम्मेदारी से था।
चौथी सीख—हर योगदान दिखाई नहीं देता। इतिहास में कई बार बड़े नाम अधिक याद किए जाते हैं, लेकिन उनके पीछे काम करने वाले अनेक लोगों का योगदान भी उतना ही मूल्यवान होता है।
आज के समय में भी हमारे आसपास हैं अनेक सुमंत्र
सुमंत्र की यह कथा आज के जीवन से भी जुड़ती है। हमारे आसपास ऐसे अनेक लोग हैं, जो दूसरों को उनकी मंजिल तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
वह एंबुलेंस चालक, जो किसी गंभीर रोगी को समय पर अस्पताल पहुँचाने के लिए दिन-रात मेहनत करता है। वह स्कूल बस चालक, जो बच्चों को सुरक्षित स्कूल पहुँचाता है। वह ऑटो या रिक्शा चालक, जो जरूरत के समय किसी की सहायता करता है। ये सभी अपने काम के माध्यम से समाज की सेवा करते हैं।
इसी तरह, जो व्यक्ति किसी दिव्यांग बच्चे को नियमित रूप से स्कूल पहुँचाने में मदद करता है, वह भी उस बच्चे की शिक्षा और आत्मनिर्भरता की यात्रा का महत्वपूर्ण साथी बनता है।
हम अक्सर उनकी सेवाओं का लाभ तो लेते हैं, लेकिन उनके योगदान के लिए धन्यवाद कहना भूल जाते हैं।
इस दीपावली अपने जीवन के सारथियों का सम्मान करें
दीपावली प्रकाश, प्रेम और खुशियाँ बाँटने का पर्व है। इस अवसर पर अपने घर को रोशन करने के साथ उन लोगों के जीवन में भी खुशियाँ लाने का प्रयास करें, जो प्रतिदिन दूसरों की सहायता करते हैं।
इस दीपावली अपने वाहन चालक, स्कूल बस चालक, ऑटो चालक या किसी ऐसे व्यक्ति को धन्यवाद कहें, जो आपकी यात्रा को आसान बनाता है। उन्हें मिठाई दें या अपनी सामर्थ्य के अनुसार कोई छोटा-सा उपहार दें।
यदि आपके आसपास कोई दिव्यांग बच्चा है, जिसे स्कूल आने-जाने में परेशानी होती है, तो उसकी मदद करने का प्रयास करें। आप उसके लिए सुरक्षित परिवहन की व्यवस्था में सहयोग कर सकते हैं या ऐसे किसी प्रयास से जुड़ सकते हैं, जो बच्चों की शिक्षा तक पहुँच आसान बनाए।
क्योंकि किसी को उसकी मंजिल तक पहुँचाने वाला व्यक्ति केवल रास्ता तय नहीं करवाता, बल्कि उसके सपनों की यात्रा में भी सहभागी बनता है।
महामंत्री सुमंत्र की कथा हमें यही याद दिलाती है कि हर महान यात्रा के पीछे किसी न किसी सारथी का योगदान होता है। इसलिए इस दीपावली उन सभी सारथियों का सम्मान करें, जो बिना किसी अपेक्षा के दूसरों का रास्ता आसान बनाते हैं।
बोलिए—
महामंत्री सुमंत्र की जय!
राजा दशरथ की जय!
भगवान श्रीराम की जय!
अयोध्या के दीपोत्सव की जय!
श्री राम जय राम जय जय राम।
