नरक चतुर्दशी की कथा: भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध कर 16,100 स्त्रियों को कैसे मुक्त कराया?

Published On November 5, 2026

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ॐ गं गणपतये नमः।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

दीपावली केवल एक दिन का पर्व नहीं, बल्कि पाँच दिनों तक चलने वाला उत्सव है। धनतेरस से शुरू होकर भाई दूज तक चलने वाले इस पर्व के हर दिन का अपना धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। इन्हीं दिनों में एक विशेष दिन आता है—नरक चतुर्दशी, जिसे छोटी दीपावली भी कहा जाता है।

इस दिन कई स्थानों पर लोग सूर्योदय से पहले उठकर अभ्यंग स्नान करते हैं और शाम को दीपक जलाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि नरक चतुर्दशी का संबंध भगवान श्रीकृष्ण और नरकासुर के वध से जुड़ी एक पौराणिक कथा से है?

इस कथा में एक अत्याचारी असुर के अंत की बात है। लेकिन इसके साथ ही 16,100 बंदी राजकुमारियों की मुक्ति का प्रसंग भी आता है। यह हमें एक महत्वपूर्ण सवाल पर विचार करने की प्रेरणा देता है—जब किसी व्यक्ति के साथ अन्याय होता है, तो क्या समाज उसे सहारा देता है या उसी को दोषी ठहराने लगता है?

आइए, जानते हैं नरक चतुर्दशी से जुड़ी भगवान श्रीकृष्ण, सत्यभामा और नरकासुर की कथा।

 

कौन था नरकासुर? जानिए उसके अत्याचारों की कहानी

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, नरकासुर को भूदेवी का पुत्र माना जाता है। उसे भौमासुर के नाम से भी जाना जाता है। उसकी राजधानी प्राग्ज्योतिषपुर थी, जिसे परंपरागत रूप से वर्तमान असम के क्षेत्र से जोड़ा जाता है।

कहा जाता है कि शक्ति और सामर्थ्य प्राप्त करने के बाद नरकासुर अहंकार और अत्याचार के रास्ते पर चल पड़ा। उसने देवताओं को परेशान करना शुरू कर दिया और अनेक दिव्य वस्तुओं पर अधिकार कर लिया।

उसने देवमाता अदिति के कुंडल छीन लिए और वरुण का छत्र भी अपने अधिकार में कर लिया। इतना ही नहीं, उसने विभिन्न राजाओं की 16,100 राजकुमारियों को बलपूर्वक बंदी बनाकर अपने महल में रखा।

उन राजकुमारियों का कोई अपराध नहीं था। उन्हें केवल उनकी इच्छा के विरुद्ध बंदी बना लिया गया था। वे अपने परिवार और घर से दूर एक असुर के महल में कैद थीं।

नरकासुर के अत्याचार बढ़ते गए और अंततः देवता भी उससे परेशान हो उठे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि इस अत्याचारी का अंत कैसे किया जाए।

 

इंद्र ने भगवान श्रीकृष्ण से माँगी सहायता

नरकासुर के अत्याचारों से परेशान होकर देवराज इंद्र भगवान श्रीकृष्ण के पास द्वारका पहुँचे।

उन्होंने श्रीकृष्ण को बताया कि नरकासुर ने देवताओं का अपमान किया है, माता अदिति के कुंडल छीन लिए हैं और अनेक राजकुमारियों को अपने महल में बंदी बना रखा है।

इंद्र की बात सुनकर भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर के अत्याचारों का अंत करने का निश्चय किया।

इस अभियान में उनकी पत्नी सत्यभामा भी उनके साथ जाने के लिए तैयार हुईं। सत्यभामा साहसी और पराक्रमी थीं। वे भगवान श्रीकृष्ण के साथ गरुड़ पर सवार हुईं और दोनों प्राग्ज्योतिषपुर की ओर चल पड़े।

 

प्राग्ज्योतिषपुर का अभेद्य किला और मुरासुर का अंत

नरकासुर की राजधानी प्राग्ज्योतिषपुर साधारण नगर नहीं थी। उसके चारों ओर मजबूत सुरक्षा व्यवस्था थी। पर्वतों, अस्त्र-शस्त्रों, जल, अग्नि और वायु से जुड़ी बाधाओं के कारण वहाँ पहुँचना कठिन था।

किले की रक्षा के लिए मुर नाम का एक शक्तिशाली असुर भी तैनात था। उसके पाँच सिर थे और वह नरकासुर का प्रमुख रक्षक माना जाता था।

भगवान श्रीकृष्ण ने अपने पराक्रम से किले की सुरक्षा व्यवस्था को पार किया। जब मुरासुर युद्ध के लिए सामने आया, तो श्रीकृष्ण ने उसका वध कर दिया। इसके बाद उन्होंने मुरासुर के पुत्रों और नरकासुर की सेना का भी सामना किया।

मुरासुर का वध करने के कारण भगवान श्रीकृष्ण को मुरारी नाम से भी जाना जाता है।

अब नरकासुर के सामने स्वयं भगवान श्रीकृष्ण थे।

 

भगवान श्रीकृष्ण और नरकासुर के बीच भयंकर युद्ध

मुरासुर और उसकी सेना के पराजित होने के बाद नरकासुर स्वयं युद्धभूमि में आया। उसने अपने हाथी पर सवार होकर भगवान श्रीकृष्ण पर आक्रमण किया।

दोनों ओर से भयंकर युद्ध होने लगा। नरकासुर ने अनेक अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग किया, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने उसके सभी प्रयास विफल कर दिए।

अंततः जब नरकासुर युद्ध में कमजोर पड़ गया, तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से उसका वध कर दिया।

भागवत पुराण के दशम स्कंध के अध्याय 59 में इस प्रसंग का वर्णन मिलता है। इस वर्णन के अनुसार, नरकासुर का वध भगवान श्रीकृष्ण ने किया था। सत्यभामा उस युद्ध में उनके साथ उपस्थित थीं।

हालाँकि, कुछ अन्य प्रचलित धार्मिक परंपराओं में सत्यभामा को भूदेवी का स्वरूप माना गया है और नरकासुर के वध में उनकी भूमिका को विशेष महत्व दिया गया है। इसलिए इस कथा के अलग-अलग रूपों में नरकासुर-वध का विवरण अलग मिलता है।

 

नरकासुर के अंत के बाद मुक्त हुईं 16,100 राजकुमारियाँ

नरकासुर का अंत होने के बाद भगवान श्रीकृष्ण उसके महल में पहुँचे। वहाँ उन्होंने 16,100 राजकुमारियों को बंदी अवस्था में पाया।

वे सभी विभिन्न राजाओं से बलपूर्वक लाई गई थीं। लंबे समय से अपने परिवारों और घरों से दूर रहने के कारण वे कठिन परिस्थिति में थीं।

भगवान श्रीकृष्ण को देखकर उनके मन में आशा जागी। भागवत पुराण के अनुसार, उन राजकुमारियों ने श्रीकृष्ण को अपना पति स्वीकार करने की इच्छा व्यक्त की।

श्रीकृष्ण ने उन्हें सम्मानपूर्वक वस्त्र और आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराईं और उन्हें धन-संपत्ति के साथ द्वारका भेजने की व्यवस्था की।

 

श्रीकृष्ण ने उन राजकुमारियों को पत्नी के रूप में क्यों स्वीकार किया?

यह इस कथा का एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील पक्ष है।

भागवत पुराण में वर्णन मिलता है कि उन राजकुमारियों ने स्वयं भगवान श्रीकृष्ण को अपना पति स्वीकार करने की इच्छा प्रकट की। भगवान ने उनकी इच्छा स्वीकार की और उनसे विवाह किया। पुराण के अनुसार, श्रीकृष्ण ने अपनी दिव्य शक्ति से 16,100 अलग-अलग रूप धारण किए और प्रत्येक राजकुमारी के साथ अलग-अलग महल में निवास किया।

इस प्रसंग को केवल विवाह की कथा के रूप में ही नहीं, बल्कि उन स्त्रियों की मुक्ति और सम्मान से जुड़ी धार्मिक परंपरा के रूप में भी समझा जाता है।

लोकप्रिय कथाओं और बाद की व्याख्याओं में यह भाव भी मिलता है कि बंदी बनाए जाने के कारण उन स्त्रियों को समाज में स्वीकार किए जाने की चिंता थी। इस दृष्टि से श्रीकृष्ण का उन्हें अपनाना उनके सम्मान और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है।

यह संवाद भागवत पुराण के मूल वर्णन में विस्तार से नहीं मिलता, लेकिन कथा से जुड़ी इस सामाजिक व्याख्या में एक महत्वपूर्ण संदेश है—जिसके साथ अन्याय हुआ हो, उसे उसके साथ हुए अन्याय के लिए दोषी नहीं ठहराना चाहिए।

 

नरक चतुर्दशी पर दीपक क्यों जलाए जाते हैं?

नरकासुर के वध के साथ नरक चतुर्दशी पर दीप जलाने की परंपरा भी जुड़ी हुई है।

कुछ क्षेत्रों में प्रचलित लोकमान्यता के अनुसार, नरकासुर ने अपने अंतिम समय में इच्छा व्यक्त की थी कि उसकी मृत्यु का दिन शोक के बजाय प्रकाश और उत्सव के रूप में मनाया जाए। इसी मान्यता के आधार पर इस दिन दीप जलाने की परंपरा को समझाया जाता है।

हालाँकि, यह प्रसंग भागवत पुराण के नरकासुर-वध अध्याय में नहीं मिलता। इसलिए इसे लोकपरंपरा के रूप में समझना उचित है।

इस दिन कई क्षेत्रों में सूर्योदय से पहले अभ्यंग स्नान करने और शाम को दीपक जलाने की परंपरा है। इन रीति-रिवाजों का उद्देश्य बुराई पर अच्छाई की विजय और जीवन में प्रकाश के आगमन का प्रतीकात्मक उत्सव मनाना है।

 

नरकासुर की कथा से आज के समाज को क्या सीख मिलती है?

नरकासुर का अंत बहुत पहले हो गया, लेकिन इस कथा से जुड़ा एक सवाल आज भी हमारे समाज के सामने है—क्या हम अन्याय का शिकार हुए व्यक्ति को सम्मान और अपनापन देते हैं?

किसी स्त्री या बच्चे के साथ अन्याय हुआ हो, तो गलती उस व्यक्ति की नहीं होती। उसे चुप रहने के लिए मजबूर करना, उसके चरित्र पर सवाल उठाना या उसे समाज से अलग कर देना एक और अन्याय है।

इसी तरह, किसी दिव्यांग व्यक्ति को उसकी शारीरिक स्थिति के कारण कमतर समझना या किसी जरूरतमंद को बोझ मान लेना भी गलत है। किसी व्यक्ति की पहचान उसकी कठिनाइयों से नहीं, बल्कि उसके व्यक्तित्व, अधिकारों और संभावनाओं से होनी चाहिए।

भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बंदी राजकुमारियों को मुक्त कराने की कथा हमें यह प्रेरणा देती है कि हमें उन लोगों के साथ खड़ा होना चाहिए जिन्हें सुरक्षा, सम्मान और सहयोग की आवश्यकता है।

 

इस दीपावली किसी जरूरतमंद के जीवन में आशा का दीप जलाएँ

दीपावली और नरक चतुर्दशी हमें अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का संदेश देते हैं। यह प्रकाश केवल हमारे घरों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि समाज के उन लोगों तक भी पहुँचना चाहिए जिन्हें सहयोग और अवसरों की आवश्यकता है।

हमारे समाज में अनेक दिव्यांग बच्चे और जरूरतमंद परिवार हैं, जिन्हें शिक्षा, चिकित्सा, पुनर्वास और सहायक उपकरणों की जरूरत होती है। आर्थिक कठिनाइयों के कारण कई बार वे आवश्यक सुविधाओं तक नहीं पहुँच पाते।

ऐसे में हम अपनी क्षमता के अनुसार उनकी सहायता कर सकते हैं। किसी बच्चे की शिक्षा में सहयोग देकर, किसी जरूरतमंद के उपचार में योगदान देकर या किसी दिव्यांग व्यक्ति को कृत्रिम अंग और सहायक उपकरण उपलब्ध कराने में मदद करके हम उसके जीवन को बेहतर बनाने में भागीदार बन सकते हैं।

इस दीपावली जब आप अपने घर के बाहर दीपक जलाएँ, तो उन लोगों के लिए भी आशा का दीप जलाने का संकल्प लें जिन्हें समाज में सम्मान, सहयोग और अवसरों की जरूरत है।

किसी जरूरतमंद व्यक्ति से यह न पूछें कि उसके जीवन में कठिनाइयाँ क्यों आईं। बल्कि उसे यह भरोसा दें कि वह सम्मान और सहयोग का अधिकारी है।

क्योंकि सच्चा प्रकाश वही है, जो किसी दूसरे के जीवन का अंधकार कम करे।

बोलिए—

भगवान श्रीकृष्ण की जय!
माता सत्यभामा की जय!
द्वारकाधीश की जय!
दीपावली महापर्व की जय!

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।