राजा पृथु और पृथ्वी की कथा: जब धरती गाय बनकर भागी और राजा ने उसका दोहन किया

Published On November 6, 2026

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गोवत्स द्वादशी के अवसर पर हम गाय और बछड़े के प्रति प्रेम, सेवा और कृतज्ञता का भाव रखते हैं। हमारी पौराणिक परंपरा में एक ऐसी कथा भी आती है, जिसमें स्वयं पृथ्वी गाय का रूप धारण करती हैं। एक ओर भूख से व्याकुल प्रजा है, तो दूसरी ओर धनुष उठाए राजा पृथु हैं, जो अपनी प्रजा के लिए अन्न प्राप्त करना चाहते हैं।

यह कथा है राजा पृथु और धरती माता की। श्रीमद्भागवत महापुराण के चतुर्थ स्कंध में वर्णित यह प्रसंग बताता है कि एक राजा का धर्म केवल शासन करना नहीं, बल्कि अपनी प्रजा के जीवन और आजीविका की व्यवस्था करना भी है।

 

राजा वेन का अत्याचार और ऋषियों का निर्णय

प्राचीन समय में वेन नाम का एक राजा हुआ। वह अहंकारी और अत्याचारी था। उसने अपने राज्य में यज्ञ, देवताओं की पूजा और धार्मिक अनुष्ठानों का विरोध करना शुरू कर दिया। वह चाहता था कि प्रजा केवल उसी की पूजा करे और उसे ही सर्वोच्च माने।

ऋषियों ने राजा वेन को कई बार समझाने का प्रयास किया, लेकिन उसके व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आया। अंततः ऋषियों ने मंत्रबल से उसका अंत कर दिया।

राजा के न रहने से राज्य में अव्यवस्था फैलने लगी। प्रजा की रक्षा और शासन की व्यवस्था करने वाला कोई राजा नहीं था।

तब ऋषियों ने विचार किया कि राज्य को एक योग्य शासक की आवश्यकता है। उन्होंने वेन के शरीर का मंथन किया। सबसे पहले उसकी जंघाओं से एक छोटा और गहरे रंग का पुरुष प्रकट हुआ। ऋषियों ने उसे निषाद नाम दिया।

इसके बाद ऋषियों ने वेन की भुजाओं का मंथन किया। उनसे एक तेजस्वी पुरुष प्रकट हुए। उनके शरीर पर दिव्य आभा थी और वे राजसी तेज से संपन्न थे। उनके साथ अर्चि नाम की दिव्य देवी भी प्रकट हुईं, जिन्हें पृथु की पत्नी माना गया।

ऋषियों ने उस पुरुष को राजा पृथु के नाम से अभिषिक्त किया। उन्हें भगवान विष्णु का अंशावतार माना गया। देवताओं ने भी उन्हें अनेक राजचिह्न और उपहार प्रदान किए।

इस प्रकार पृथु ने राजा का दायित्व संभाला और प्रजा के पालन का संकल्प लिया।

 

राज्य में अकाल और भूखी प्रजा की पुकार

राजा पृथु के सामने सबसे बड़ी समस्या थी—प्रजा की भूख।

राज्य में अन्न और वनस्पतियों का अभाव था। लोग अपनी आजीविका के लिए परेशान थे। खेती और भोजन की व्यवस्था प्रभावित हो चुकी थी।

भूखी प्रजा राजा पृथु के पास पहुँची। उन्होंने अपनी पीड़ा बताई और उनसे सहायता की प्रार्थना की।

राजा पृथु ने जब अपनी प्रजा की कठिनाई देखी, तो वे चिंतित हो उठे। उन्होंने विचार किया कि पृथ्वी पर अन्न और वनस्पतियों के बीज मौजूद हैं, फिर भी लोगों को भोजन क्यों नहीं मिल रहा?

उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से समझा कि पृथ्वी ने औषधियों और अन्न के बीजों को अपने भीतर छिपा लिया है।

 

पृथ्वी ने गाय का रूप धारण कर राजा पृथु से बचने का प्रयास किया

जब राजा पृथु ने पृथ्वी को अन्न और वनस्पतियाँ प्रकट करने के लिए कहा, तब भी उनकी समस्या का समाधान नहीं हुआ।

क्रोधित होकर उन्होंने धनुष उठाया और पृथ्वी को दंड देने के लिए आगे बढ़े।

राजा को अस्त्र उठाए अपनी ओर आते देखकर पृथ्वी भयभीत हो गई। उसने गाय का रूप धारण कर लिया और वहाँ से भागने लगी।

राजा पृथु भी धनुष पर बाण चढ़ाकर उसके पीछे चल पड़े।

पृथ्वी सभी दिशाओं में भागी। वह जहाँ भी शरण लेने का प्रयास करती, राजा पृथु उसका पीछा करते हुए वहाँ पहुँच जाते। अंततः उसे समझ आ गया कि राजा से बचना संभव नहीं है।

वह वापस लौटी और राजा के सामने उपस्थित होकर उनसे अपने प्राणों की रक्षा करने की प्रार्थना करने लगी।

 

पृथ्वी ने राजा पृथु को समझाया अपनी समस्या का कारण

पृथ्वी ने राजा से कहा,

“राजन, आप प्रजा के रक्षक हैं। आप जानते हैं कि समस्त जीवों का जीवन मुझ पर निर्भर है। यदि आप मुझे ही नष्ट कर देंगे, तो आपकी प्रजा का पालन कैसे होगा? जिस पृथ्वी पर आपका राज्य टिका है, उसी को नष्ट करने से सभी जीवों का जीवन संकट में पड़ जाएगा।”

राजा पृथु ने उससे पूछा कि जब प्रजा भूख से परेशान है, तब उसने अन्न और बीजों को अपने भीतर क्यों छिपा लिया?

पृथ्वी ने बताया कि पहले के शासकों की उपेक्षा और अव्यवस्था के कारण संसार में चोरी और अनुचित व्यवहार बढ़ गया था। वनस्पतियों और अन्न के बीजों का उचित संरक्षण नहीं हो रहा था। इसलिए उसने आवश्यक बीज और औषधियाँ अपने भीतर छिपा ली थीं।

उसने राजा से कहा कि यदि वे सचमुच अपनी प्रजा का कल्याण चाहते हैं, तो भूमि को खेती योग्य बनाएं। वर्षा का जल धरती पर ठहर सके, इसके लिए भूमि को समतल करें। साथ ही एक बछड़ा, एक पात्र और दुहने वाले की व्यवस्था करें।

तब वह अपनी शक्ति के अनुसार सभी जीवों की आवश्यकताओं को पूरा करेगी।

पृथ्वी की बात सुनकर राजा पृथु का क्रोध शांत हुआ। उन्होंने उसकी बात स्वीकार कर ली और प्रजा के कल्याण के लिए आवश्यक व्यवस्था करने का निश्चय किया।

 

राजा पृथु ने धरती को खेती योग्य बनाया

राजा पृथु ने पृथ्वी की बात मानकर भूमि को खेती के योग्य बनाने का कार्य शुरू किया।

उन्होंने अपने धनुष की शक्ति से ऊँची पहाड़ियों की चोटियों को तोड़ा और ऊबड़-खाबड़ भूमि को समतल कराया। इससे खेती, जल-संग्रह और लोगों के रहने के लिए उपयुक्त स्थान तैयार करने में सहायता मिली।

उन्होंने गाँवों, नगरों, बस्तियों और अन्य निवास-स्थानों की व्यवस्था भी कराई।

इस प्रकार पृथ्वी पर व्यवस्थित बसावट और कृषि के विकास से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रसंग राजा पृथु के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

 

राजा पृथु ने पृथ्वी का दोहन किया

अब पृथ्वी ने अपना वचन पूरा करने की तैयारी की।

राजा पृथु ने स्वायंभुव मनु को बछड़ा बनाया और अपने दोनों हाथों को पात्र के रूप में इस्तेमाल किया। इसके बाद उन्होंने पृथ्वी का दोहन किया।

पृथ्वी से अन्न, बीज और अनेक प्रकार की वनस्पतियाँ प्राप्त हुईं। इससे प्रजा की भोजन संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने का मार्ग खुला।

राजा पृथु ने अपनी प्रजा के कल्याण के लिए पृथ्वी से प्राप्त संसाधनों का उपयोग किया। इस प्रसंग में पृथ्वी को गाय के रूप में और राजा को उसका दोहन करने वाले के रूप में दिखाया गया है।

राजा पृथु इस उपलब्धि से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने पृथ्वी को अपनी पुत्री के समान स्नेह दिया।

इसी परंपरा में पृथ्वी को पृथु की पुत्री कहा गया और उनका नाम पृथ्वी पड़ा।

 

अलग-अलग जीवों ने अपनी आवश्यकता के अनुसार पृथ्वी का दोहन किया

कथा में आगे बताया गया है कि राजा पृथु के उदाहरण से प्रेरित होकर दूसरे समूहों ने भी पृथ्वी का दोहन किया।

हर समूह ने अपनी आवश्यकता के अनुसार एक बछड़ा, एक पात्र और दोहन करने वाले की व्यवस्था की।

ऋषियों ने बृहस्पति को बछड़ा बनाकर वेदों का ज्ञान प्राप्त किया।

देवताओं ने इंद्र को बछड़ा बनाया और सोम तथा मन, शरीर और इंद्रियों की शक्ति से जुड़ा पोषण प्राप्त किया।

पितरों ने अर्यमा को बछड़ा बनाया और पितरों के लिए आवश्यक अन्न-आहुति प्राप्त की।

नागों ने तक्षक को बछड़ा बनाकर विष प्राप्त किया।

पर्वतों ने हिमालय को बछड़ा बनाकर खनिज पदार्थ प्राप्त किए।

इस प्रकार पृथ्वी ने अलग-अलग जीवों और समूहों को उनकी प्रकृति तथा आवश्यकता के अनुसार संसाधन प्रदान किए।

यह प्रसंग बताता है कि पृथ्वी पर अनेक प्रकार के संसाधन हैं और अलग-अलग जीव अपनी आवश्यकताओं के अनुसार उनसे लाभ प्राप्त करते हैं।

 

राजा पृथु और धरती माता की कथा से हमें क्या सीख मिलती है?

राजा पृथु और पृथ्वी की यह कथा केवल एक पौराणिक प्रसंग नहीं है। इसमें शासन, जिम्मेदारी, प्रकृति और संसाधनों के सही उपयोग से जुड़ी कई महत्वपूर्ण सीख मिलती हैं।

  1. राजा का पहला धर्म प्रजा का पालन करना है।

राजा पृथु ने अपनी प्रजा की भूख और परेशानी को अपनी जिम्मेदारी माना। उन्होंने केवल शासन करने के बजाय अन्न और आजीविका की व्यवस्था करने का प्रयास किया। यह एक आदर्श शासक का महत्वपूर्ण गुण है।

  1. प्रकृति का संरक्षण आवश्यक है।

पृथ्वी ने राजा को बताया कि जब संसाधनों की उपेक्षा होती है और उनका उचित उपयोग नहीं किया जाता, तब जीवन की आवश्यकताएँ प्रभावित होती हैं। यह प्रसंग हमें प्रकृति, वनस्पतियों, जल और भूमि के संरक्षण का महत्व समझाता है।

  1. क्रोध से पहले संवाद और समझ जरूरी है।

राजा पृथु ने पहले क्रोध में धनुष उठाया, लेकिन पृथ्वी की बात सुनने के बाद अपनी सोच बदली। यह हमें सिखाता है कि किसी भी समस्या का समाधान निकालने से पहले उसका कारण समझना जरूरी है।

  1. पृथ्वी के संसाधनों का उपयोग जिम्मेदारी से होना चाहिए।

कथा में अलग-अलग समूहों को उनकी प्रकृति और आवश्यकता के अनुसार पृथ्वी से संसाधन मिलते हैं। इसका आधुनिक संदेश यह है कि प्रकृति से उतना ही लें, जितना आवश्यक हो, और उसके संरक्षण की जिम्मेदारी भी निभाएँ।

 

इस दीपावली पर किसी भूखे परिवार तक भोजन पहुँचाएँ

राजा पृथु की कथा में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने प्रजा की भूख को अपनी जिम्मेदारी माना। उनके लिए राजधर्म का अर्थ था कि राज्य में रहने वाले लोगों को जीवन की आवश्यक सुविधाएँ मिलें।

आज भी हमारे आसपास ऐसे परिवार हैं, जिनके लिए दो समय का भोजन जुटाना कठिन होता है। किसी घर में आर्थिक परेशानी के कारण चूल्हा नहीं जलता, तो कहीं कोई वृद्ध या दिव्यांग व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं के लिए दूसरों पर निर्भर रहता है।

इस दीपावली पर आइए, हम भी अपने सामर्थ्य के अनुसार किसी जरूरतमंद परिवार तक भोजन और आवश्यक सामग्री पहुँचाने का संकल्प लें।

किसी भूखे परिवार को भोजन कराएँ। किसी अकेले वृद्ध व्यक्ति तक मिठाई और जरूरी सामान पहुँचाएँ। किसी जरूरतमंद बच्चे की भोजन और शिक्षा संबंधी आवश्यकताओं में सहयोग करें।

याद रखिए, प्रकृति ने हमें जो कुछ दिया है, उसका सदुपयोग और जरूरतमंदों के साथ साझा करना हमारी सामाजिक जिम्मेदारी है।

राजा पृथु की कथा हमें यही प्रेरणा देती है कि सच्चा धर्म केवल अपने लिए संसाधन जुटाने में नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन को बेहतर बनाने में भी है।

बोलिए—

महाराज पृथु की जय!

माता पृथ्वी की जय!

धरती माता की जय!

गौ माता की जय!

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।