रामायण की कथा में भगवान श्रीराम, लक्ष्मण और भरत के त्याग, प्रेम और समर्पण का वर्णन अक्सर सुनने को मिलता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान श्रीराम के एक ऐसे छोटे भाई भी थे, जिनका योगदान बहुत महत्वपूर्ण था, फिर भी उनकी कथा अपेक्षाकृत कम सुनाई जाती है?
वे थे महारानी सुमित्रा के दूसरे पुत्र शत्रुघ्न।
शत्रुघ्न केवल भरत के साथ रहने वाले भाई ही नहीं थे, बल्कि एक पराक्रमी योद्धा भी थे। उन्होंने एक ऐसे अत्याचारी राक्षस का वध किया, जिसके भय से ऋषि-मुनि यमुना के तट पर अपना जीवन शांति से नहीं बिता पा रहे थे। इसी विजय के बाद उनका संबंध उस नगरी से जुड़ा, जिसे आज हम मथुरा के नाम से जानते हैं।
आइए, जानते हैं रामायण के इस कम चर्चित प्रसंग की पूरी कथा।
शत्रुघ्न: रामायण के चौथे भाई की अनसुनी कहानी
अयोध्या के महाराज दशरथ के चार पुत्र थे—श्रीराम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न। महारानी कौशल्या के पुत्र श्रीराम, कैकेयी के पुत्र भरत और सुमित्रा के दो पुत्र लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न थे।
बचपन से ही चारों भाइयों में गहरा प्रेम था। लक्ष्मण का विशेष स्नेह श्रीराम के प्रति था, जबकि शत्रुघ्न अधिकतर समय भरत के साथ बिताते थे।
दोनों की मित्रता और भाईचारा इतना गहरा था कि वे एक-दूसरे के सुख-दुख में हमेशा साथ खड़े रहते थे।
जब माता कैकेयी के वरदानों के कारण श्रीराम को चौदह वर्ष का वनवास मिला, उस समय भरत और शत्रुघ्न अपने ननिहाल में थे। अयोध्या लौटने पर जब उन्हें पूरी घटना का पता चला, तो दोनों भाई अत्यंत दुखी हुए।
भरत ने अपनी माता कैकेयी के निर्णय का विरोध किया और श्रीराम को वापस लाने का निश्चय किया। वहीं शत्रुघ्न का क्रोध मंथरा पर फूट पड़ा, जिसे इस पूरे घटनाक्रम के पीछे प्रमुख कारण माना जाता था।
रामायण के प्रचलित वर्णनों में आता है कि शत्रुघ्न ने मंथरा को दंड देने के लिए पकड़ लिया, लेकिन भरत ने उन्हें रोक दिया। भरत का कहना था कि श्रीराम को यह जानकर दुख होगा कि उनके भाइयों ने क्रोध में आकर किसी स्त्री के साथ दुर्व्यवहार किया।
भरत की बात सुनकर शत्रुघ्न शांत हो गए।
यह प्रसंग उनके स्वभाव का एक पक्ष दिखाता है—वे अपने भाई के प्रति प्रेम और सम्मान रखते थे तथा उसके विचारों को महत्व देते थे।
चौदह वर्षों तक भरत के साथ निभाया साथ
जब भरत श्रीराम को वापस लाने के लिए चित्रकूट पहुँचे, तब श्रीराम ने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए वनवास पूरा करने का निश्चय दोहराया।
भरत ने श्रीराम की पादुकाएँ अयोध्या लाकर सिंहासन पर स्थापित कीं और स्वयं नंदीग्राम में रहकर उनके प्रतिनिधि के रूप में राज्य का संचालन किया।
इस कठिन समय में शत्रुघ्न भी भरत के साथ खड़े रहे। उन्होंने भरत के कार्यों में सहयोग दिया और परिवार तथा राज्य की जिम्मेदारियों को निभाने में अपना योगदान दिया।
जहाँ भरत का त्याग रामायण की प्रसिद्ध कथाओं में विशेष रूप से याद किया जाता है, वहीं शत्रुघ्न का योगदान अक्सर चर्चा से दूर रह जाता है।
लेकिन किसी बड़े कार्य की सफलता के पीछे ऐसे अनेक लोगों का सहयोग होता है, जिनका नाम भले ही सामने न आए, लेकिन जिनके बिना वह कार्य पूरा नहीं हो सकता।
ऋषियों की पुकार और लवणासुर का अत्याचार
समय बीतता गया। चौदह वर्षों का वनवास पूरा हुआ और श्रीराम अयोध्या लौट आए। उनका राज्याभिषेक हुआ और अयोध्या में फिर से सुख-शांति स्थापित हुई।
कुछ समय बाद यमुना नदी के आसपास रहने वाले ऋषि-मुनि श्रीराम के दरबार में पहुँचे। उनके चेहरों पर चिंता और भय साफ दिखाई दे रहा था।
उन्होंने श्रीराम को बताया कि यमुना के तट पर मधु नामक राक्षस का पुत्र लवणासुर रहता है। वह अत्यंत शक्तिशाली और क्रूर है। उसके अत्याचारों के कारण ऋषि-मुनियों के यज्ञ बाधित हो रहे हैं और क्षेत्र के लोग भयभीत जीवन जी रहे हैं।
लवणासुर के पास भगवान शिव से प्राप्त एक दिव्य त्रिशूल था। मान्यता थी कि जब तक वह त्रिशूल उसके पास रहता, तब तक उसे पराजित करना अत्यंत कठिन था।
ऋषियों की पीड़ा सुनकर श्रीराम ने उन्हें सहायता का आश्वासन दिया।
उन्होंने सभा में उपस्थित अपने भाइयों की ओर देखा और पूछा कि इस अत्याचारी का अंत करने के लिए कौन आगे आएगा?
तभी शत्रुघ्न ने आगे बढ़कर कहा,
“भैया, मुझे यह कार्य करने का अवसर दीजिए। मैं लवणासुर का अंत करके ऋषि-मुनियों को उसके भय से मुक्त कराना चाहता हूँ।”
शत्रुघ्न की बात सुनकर श्रीराम प्रसन्न हुए। उन्होंने उन्हें इस कठिन अभियान की जिम्मेदारी सौंपी और एक दिव्य बाण प्रदान किया।
लवणासुर के वध की योजना
श्रीराम ने शत्रुघ्न को बताया कि लवणासुर का त्रिशूल उसके पास हर समय नहीं रहता। जब वह भोजन की तलाश में बाहर जाता है, तब उसका त्रिशूल उसके निवास पर ही रहता है।
इसलिए शत्रुघ्न को उचित समय देखकर उसके लौटने से पहले द्वार पर प्रतीक्षा करनी थी। जब लवणासुर त्रिशूल के बिना वापस आए, तब उसे युद्ध के लिए ललकारना था।
श्रीराम ने उन्हें एक दिव्य बाण भी दिया, जिसकी सहायता से लवणासुर का वध किया जा सकता था।
इसके साथ ही उन्होंने शत्रुघ्न को उस क्षेत्र का शासन सौंपने का निर्णय लिया, ताकि वहाँ के लोगों को एक सुरक्षित और व्यवस्थित जीवन मिल सके।
शत्रुघ्न ने बड़े भाई का आशीर्वाद लिया और सेना के साथ यमुना के तट की ओर प्रस्थान किया।
महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में लव और कुश के जन्म का समाचार
यमुना की ओर जाते समय शत्रुघ्न मार्ग में महर्षि वाल्मीकि के आश्रम पहुँचे। महर्षि ने उनका आदर-सत्कार किया और उन्हें आश्रम में विश्राम करने का स्थान दिया।
यह वही आश्रम था जहाँ माता सीता निवास कर रही थीं।
वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड के अनुसार, जिस रात शत्रुघ्न आश्रम में ठहरे, उसी रात माता सीता ने जुड़वाँ पुत्रों को जन्म दिया।
आश्रम के तपस्वियों ने आधी रात को महर्षि वाल्मीकि को यह शुभ समाचार दिया। महर्षि ने दोनों बालकों की रक्षा के लिए धार्मिक अनुष्ठान किया और उनका नाम कुश तथा लव रखा।
शत्रुघ्न को भी दोनों बालकों के जन्म का समाचार मिला। यह सुनकर वे प्रसन्न हुए और माता सीता के लिए मंगलकामना की।
अगली सुबह महर्षि को प्रणाम करके वे अपने अभियान पर आगे बढ़ गए।
लवणासुर और शत्रुघ्न के बीच भयंकर युद्ध
आगे चलकर शत्रुघ्न यमुना के तट पर पहुँचे। उन्होंने अपनी योजना के अनुसार लवणासुर के लौटने की प्रतीक्षा की।
जब लवणासुर भोजन की तलाश में बाहर गया हुआ था, तब शत्रुघ्न ने उसके निवास के द्वार के पास अपना स्थान बनाया।
संध्या के समय लवणासुर वापस लौटा। उसके हाथों में शिकार था और वह अपने निवास में प्रवेश करने ही वाला था कि शत्रुघ्न उसके सामने आ गए।
उन्होंने धनुष उठाकर उसे युद्ध के लिए ललकारा।
लवणासुर ने सामने खड़े योद्धा को देखा और क्रोध से भर उठा। उसने शत्रुघ्न पर वृक्षों और भारी वस्तुओं से प्रहार करना शुरू कर दिया।
लेकिन शत्रुघ्न ने अपने बाणों से उसके हमलों को विफल कर दिया।
दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। अंततः शत्रुघ्न ने श्रीराम द्वारा दिया गया दिव्य बाण अपने धनुष पर चढ़ाया और पूरी शक्ति से छोड़ दिया।
वह बाण सीधे लवणासुर के शरीर में जा लगा। प्रहार इतना शक्तिशाली था कि लवणासुर धरती पर गिर पड़ा और उसका अंत हो गया।
इस प्रकार शत्रुघ्न ने ऋषि-मुनियों को उसके अत्याचारों से मुक्त कराया।
शत्रुघ्न और मथुरा नगरी का संबंध
लवणासुर के वध के बाद देवताओं ने शत्रुघ्न की विजय पर प्रसन्नता व्यक्त की और उनसे वरदान माँगने को कहा।
शत्रुघ्न ने यमुना के तट पर स्थित उस सुंदर नगरी पर अधिकार प्राप्त करने की इच्छा प्रकट की।
उत्तरकांड के एक वर्णन के अनुसार, देवताओं ने उस नगरी का नाम शूरसेन बताया। शत्रुघ्न ने वहाँ अपनी सेना के साथ निवास स्थापित किया और उस स्थान को विकसित किया।
उन्होंने पहले से बने भवनों को सजवाया, मार्गों और बाजारों को व्यवस्थित कराया तथा वहाँ के लोगों के लिए सुख-समृद्धि का वातावरण बनाया।
धीरे-धीरे यह क्षेत्र एक समृद्ध नगरी के रूप में विकसित हुआ। अन्य पौराणिक और क्षेत्रीय परंपराओं में इस नगरी का संबंध मधुपुरी, मधुरा और मथुरा नामों से भी जोड़ा जाता है।
आज मथुरा भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि के रूप में विश्वभर में प्रसिद्ध है। इस प्रकार रामायण में वर्णित शत्रुघ्न की कथा का संबंध उस पवित्र भूमि से जुड़ता है, जिसे आगे चलकर श्रीकृष्ण की लीलाओं के कारण विशेष पहचान मिली।
बारह वर्षों बाद वाल्मीकि आश्रम में फिर गूँजी रामकथा
शत्रुघ्न ने उस नगरी में बारह वर्षों तक शासन किया। उनके शासन में क्षेत्र के लोग सुख और शांति से रहने लगे।
बारह वर्ष बीतने के बाद उनके मन में अपने बड़े भाई श्रीराम से मिलने की इच्छा जागी। वे अयोध्या लौटने के लिए निकले और रास्ते में एक बार फिर महर्षि वाल्मीकि के आश्रम पहुँचे।
यह वही आश्रम था जहाँ उन्होंने वर्षों पहले माता सीता के जुड़वाँ पुत्रों के जन्म का समाचार सुना था।
इस बार आश्रम में उन्हें एक अद्भुत दृश्य देखने को मिला।
दो बालक मधुर स्वर में रामायण की कथा गा रहे थे। उनके हाथों में वीणा थी और उनके स्वरों में ऐसा माधुर्य था कि सुनने वाला मंत्रमुग्ध हो जाए।
वे बालक थे—लव और कुश।
दोनों भगवान श्रीराम के जीवन की घटनाओं का वर्णन कर रहे थे। वनवास, सीता हरण, हनुमान जी की लंका यात्रा और रावण वध जैसे प्रसंग उनके गीतों में जीवंत हो उठे।
शत्रुघ्न रामकथा सुनते-सुनते भावुक हो गए। उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। उन्हें आश्चर्य हुआ कि ये बालक इतनी सुंदरता और सच्चाई के साथ श्रीराम के जीवन का वर्णन कैसे कर रहे हैं।
उनके साथ आए सैनिक भी यह सब सुनकर चकित थे। उन्होंने शत्रुघ्न से उन बालकों के बारे में पूछने की इच्छा जताई, लेकिन शत्रुघ्न ने महर्षि वाल्मीकि के प्रति सम्मान रखते हुए उनसे अनावश्यक प्रश्न करना उचित नहीं समझा।
इस प्रकार वे उन बालकों की पहचान जाने बिना ही अयोध्या की ओर आगे बढ़ गए।
वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड में वर्णित यह प्रसंग आगे चलकर लव-कुश और श्रीराम के मिलन की कथा से जुड़ता है।
शत्रुघ्न की कथा से मिलने वाली चार महत्वपूर्ण सीख
शत्रुघ्न का जीवन हमें कई ऐसे संदेश देता है, जो आज भी हमारे परिवार, समाज और कार्यक्षेत्र में उपयोगी हैं।
- सेवा का महत्व पद और प्रसिद्धि से बड़ा है
शत्रुघ्न ने भरत के साथ रहकर राज्य की जिम्मेदारियों में सहयोग दिया। उनका जीवन बताता है कि किसी बड़े उद्देश्य की सफलता में हर व्यक्ति का योगदान महत्वपूर्ण होता है, चाहे उसका नाम सामने आए या नहीं।
- अवसर मिलने पर जिम्मेदारी से पीछे नहीं हटना चाहिए
जब ऋषियों की सहायता के लिए किसी को आगे आने की आवश्यकता थी, तब शत्रुघ्न ने स्वयं यह जिम्मेदारी स्वीकार की। उन्होंने इसे सम्मान या पद का विषय नहीं बनाया, बल्कि अपना कर्तव्य समझकर निभाया।
- शक्ति का उपयोग दूसरों की रक्षा के लिए होना चाहिए
लवणासुर का वध केवल एक युद्ध की विजय नहीं था। इससे उन ऋषियों और लोगों को भय से मुक्ति मिली, जो लंबे समय से उसके अत्याचार सह रहे थे। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि शक्ति और सामर्थ्य का उपयोग समाज की रक्षा और कल्याण के लिए होना चाहिए।
- अच्छे कार्यों का प्रभाव लंबे समय तक बना रहता है
शत्रुघ्न ने जिस क्षेत्र को सुरक्षित और समृद्ध बनाने में योगदान दिया, वह आगे चलकर मथुरा के रूप में धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा। यह हमें याद दिलाता है कि आज किए गए अच्छे कार्यों का प्रभाव आने वाली पीढ़ियों तक पहुँच सकता है।
इस दीपावली उन लोगों को भी धन्यवाद दीजिए, जो चुपचाप हमारी सेवा करते हैं
शत्रुघ्न की कथा हमें उन लोगों की याद दिलाती है, जो बिना किसी प्रसिद्धि की इच्छा के अपना कर्तव्य निभाते रहते हैं।
हमारे घरों में काम करने वाले कर्मचारी, अस्पतालों में मरीजों की देखभाल करने वाली नर्सें, सफाईकर्मी, रसोई में भोजन बनाने वाले कर्मचारी, वाहन चालक और ऐसे अनेक लोग हमारे जीवन को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
कई बार हम उनकी मेहनत को रोजमर्रा की बात समझकर अनदेखा कर देते हैं। लेकिन उनके योगदान के बिना हमारा जीवन और समाज सुचारु रूप से नहीं चल सकता।
इस दीपावली एक छोटा-सा संकल्प लीजिए।
अपने घर, कार्यालय और संस्था में चुपचाप मेहनत करने वाले लोगों को उनके नाम से धन्यवाद दीजिए। उनकी मेहनत की सराहना कीजिए और अपनी सामर्थ्य के अनुसार उन्हें मिठाई, उपहार या कोई उपयोगी वस्तु भेंट कीजिए। उनके परिवार और बच्चों को भी अपनी खुशियों में शामिल कीजिए।
यदि संभव हो, तो किसी जरूरतमंद परिवार के घर भी खुशियों का एक दीप जलाइए।
क्योंकि दीपावली केवल प्रकाश और उत्सव का पर्व नहीं, बल्कि प्रेम, कृतज्ञता और दूसरों के जीवन में खुशियाँ बाँटने का अवसर भी है।
शत्रुघ्न की तरह जो लोग बिना किसी अपेक्षा के अपना योगदान देते हैं, वे भी सम्मान और पहचान के अधिकारी हैं।
इस दीपावली आइए, हम अपने आसपास मौजूद ऐसे सभी लोगों के योगदान को पहचानें और उन्हें दिल से धन्यवाद दें।
बोलिए—
शत्रुघ्न जी की जय!
भरत जी की जय!
भगवान श्रीराम की जय!
श्री राम जय राम जय जय राम।
