श्री राम जय राम जय जय राम।
ॐ हं हनुमते नमः।
कल्पना कीजिए, एक ऐसी स्त्री की, जो अपने घर-परिवार से दूर एक अनजान नगरी में बंदी है। चारों ओर पहरा है। उसे लगातार डराया जाता है और उसकी इच्छा के विरुद्ध एक निर्णय स्वीकार करने के लिए मजबूर किया जाता है।
लेकिन उसी नगरी में दो ऐसी स्त्रियाँ भी हैं, जो उसके दुख को समझती हैं। एक उसे अपने सपने के माध्यम से आशा देती है, तो दूसरी कठिन समय में उसे सच बताकर संभालती है।
यह कहानी है माता सीता की, और उन दो स्त्रियों की, जिन्हें रामायण में त्रिजटा और सरमा के नाम से जाना जाता है।
हम सभी जानते हैं कि रावण ने माता सीता का हरण करके उन्हें लंका की अशोक वाटिका में रखा था। हम यह भी जानते हैं कि हनुमान जी वहाँ पहुँचे और उन्होंने श्रीराम की अंगूठी देकर माता सीता को उनके आगमन का संदेश दिया।
लेकिन इन घटनाओं के बीच अशोक वाटिका में माता सीता ने किस तरह समय बिताया? उनकी देखरेख करने वाली राक्षसियों के बीच कौन उनके प्रति सहानुभूति रखता था?
वाल्मीकि रामायण के सुंदरकांड और युद्धकांड में इन प्रश्नों से जुड़े दो महत्वपूर्ण प्रसंग मिलते हैं।
आइए, जानते हैं त्रिजटा और सरमा की यह प्रेरक कथा।
अशोक वाटिका में माता सीता की कठिन परीक्षा
रावण द्वारा हरण किए जाने के बाद माता सीता को लंका की अशोक वाटिका में रखा गया था। रावण चाहता था कि वे श्रीराम को भूलकर उसकी बात स्वीकार कर लें।
उसने राक्षसियों को उनकी निगरानी करने और उन्हें डराने का आदेश दिया था।
वे राक्षसियाँ कभी कठोर शब्दों से सीता जी को डरातीं, कभी रावण की शक्ति का बखान करतीं और कभी उन्हें धमकातीं कि यदि उन्होंने रावण की बात नहीं मानी, तो उन्हें इसका दंड भुगतना पड़ेगा।
लेकिन माता सीता अपने निर्णय पर अडिग रहीं।
उन्होंने रावण के सामने स्पष्ट कर दिया था कि वे केवल भगवान श्रीराम की पत्नी हैं और किसी भी परिस्थिति में उसे स्वीकार नहीं करेंगी।
दिन बीतते गए। माता सीता अशोक वाटिका में वृक्ष के नीचे बैठकर श्रीराम का स्मरण करती रहीं। उनके मन में अपने प्रभु से मिलने की आशा थी, लेकिन चारों ओर का वातावरण भय और निराशा से भरा हुआ था।
इसी कठिन समय में उनके सामने आईं त्रिजटा।
त्रिजटा का स्वप्न: जब निराशा के बीच दिखाई दी आशा
सुंदरकांड के अनुसार, एक दिन राक्षसियाँ माता सीता को डराने लगीं। वे उन्हें धमकाते हुए कह रही थीं कि यदि उन्होंने रावण की बात नहीं मानी, तो वे उन्हें मार डालेंगी।
तभी एक वृद्ध राक्षसी, जिसका नाम त्रिजटा था, उठकर खड़ी हुई।
उसने दूसरी राक्षसियों से कहा कि वे माता सीता को परेशान करना बंद करें। उसने बताया कि उसने रात में एक ऐसा स्वप्न देखा है, जो राक्षसों के विनाश और श्रीराम की विजय का संकेत देता है।
त्रिजटा ने अपने स्वप्न का वर्णन करते हुए बताया कि उसने श्रीराम और लक्ष्मण को शुभ और उज्ज्वल रूप में देखा। माता सीता भी शुभ्र वस्त्रों में दिखाई दीं और उनका श्रीराम से मिलन होता नजर आया।
इसके विपरीत, उसने रावण को अपमानजनक और अशुभ अवस्था में दक्षिण दिशा की ओर जाते हुए देखा। लंका के विनाश और विभीषण के सम्मानित होने के भी संकेत उसके स्वप्न में दिखाई दिए।
यह सुनकर राक्षसियाँ घबरा गईं।
त्रिजटा ने उन्हें समझाया कि माता सीता को डराना बंद करें। उसने कहा कि उनके साथ बुरा व्यवहार करना उचित नहीं है और उन्हें माता सीता से क्षमा माँगनी चाहिए।
त्रिजटा का यह स्वप्न केवल एक सपना नहीं था, बल्कि अशोक वाटिका में निराशा के बीच आशा की एक किरण बनकर आया।
वाल्मीकि रामायण के इस प्रसंग में त्रिजटा का व्यवहार हमें बताता है कि कठिन परिस्थितियों में भी करुणा और विवेक का साथ नहीं छोड़ना चाहिए।
सरमा: जिसने माता सीता को बताया मायावी राम-मस्तक का सच
त्रिजटा की तरह सरमा भी माता सीता के प्रति सहानुभूति रखती थीं।
वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड में सरमा को माता सीता की स्नेही सहेली के रूप में वर्णित किया गया है। कुछ परंपराओं और टीकाओं में उन्हें विभीषण की पत्नी भी बताया गया है।
युद्ध के समय रावण को पता चला कि श्रीराम अपनी वानर सेना के साथ लंका पहुँच चुके हैं। वह जानता था कि अब उसका सामना एक बड़ी चुनौती से होने वाला है।
माता सीता को अपने वश में करने के लिए उसने एक छल रचा।
रावण ने मायावी विद्या जानने वाले एक राक्षस की सहायता से श्रीराम के कटे हुए सिर और उनके धनुष का भ्रम पैदा किया। फिर वह उस मायावी सिर को लेकर माता सीता के सामने पहुँचा।
उसने सीता जी से कहा कि श्रीराम युद्ध में मारे जा चुके हैं। अब उनके पास कोई सहारा नहीं बचा है और उन्हें रावण की बात मान लेनी चाहिए।
माता सीता ने उस मायावी सिर को देखा। वह श्रीराम के चेहरे जैसा दिखाई दे रहा था।
यह दृश्य देखकर वे अत्यंत दुखी हो गईं। उन्हें लगा कि कहीं सचमुच उनके प्रभु को कुछ हो तो नहीं गया। वे विलाप करने लगीं और अपने भाग्य को दोष देने लगीं।
तभी सरमा वहाँ पहुँचीं।
उन्होंने माता सीता को सांत्वना दी और बताया कि यह सब रावण की माया है। श्रीराम जीवित हैं और अपनी सेना के साथ लंका के निकट मौजूद हैं।
सरमा ने माता सीता को विश्वास दिलाया कि रावण उन्हें भ्रमित करने के लिए यह छल कर रहा है।
उनकी बात सुनकर सीता जी को राहत मिली।
सरमा ने राम की सेना और रावण की योजनाओं के समाचार भी पहुँचाए
सरमा का सहयोग केवल माता सीता को सांत्वना देने तक सीमित नहीं था।
युद्धकांड के अगले प्रसंगों में माता सीता उनसे रावण की योजनाओं और लंका में चल रही घटनाओं के बारे में पूछती हैं।
सरमा रावण की गतिविधियों और उसकी सभा में होने वाली चर्चाओं की जानकारी प्राप्त करके सीता जी तक पहुँचाती थीं।
उन्होंने माता सीता को यह भी बताया कि श्रीराम की सेना लंका के निकट पहुँच चुकी है और युद्ध की तैयारी चल रही है।
इस प्रकार सरमा ने कठिन समय में माता सीता को वास्तविक परिस्थितियों से अवगत कराया। उन्होंने उन्हें झूठे भय और भ्रम में डूबे रहने के बजाय सत्य का सहारा दिया।
वाल्मीकि रामायण का यह प्रसंग दिखाता है कि कभी-कभी किसी दुखी व्यक्ति की सबसे बड़ी सहायता उसे सही जानकारी देना और उसके मन में विश्वास बनाए रखना होता है।
त्रिजटा और सरमा की कथा से मिलने वाली चार सीख
त्रिजटा और सरमा की भूमिका रामायण के बड़े युद्ध और विजय के बीच एक मानवीय पक्ष को सामने लाती है। उनकी कथा से हमें कई महत्वपूर्ण बातें सीखने को मिलती हैं।
- अच्छाई किसी एक स्थान या समुदाय तक सीमित नहीं होती
लंका में रावण का शासन था, लेकिन उसी लंका में त्रिजटा और सरमा जैसी स्त्रियाँ भी थीं, जिन्होंने माता सीता के दुख को समझा। यह हमें सिखाता है कि किसी व्यक्ति का मूल्य उसके परिवेश से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार और कर्मों से पहचाना जाना चाहिए।
- आशा देने वाले शब्द किसी के लिए सहारा बन सकते हैं
त्रिजटा ने अपने स्वप्न के माध्यम से दूसरी राक्षसियों को माता सीता को परेशान करने से रोका। उनका व्यवहार बताता है कि सही समय पर कही गई आशा भरी बात किसी दुखी व्यक्ति को मानसिक सहारा दे सकती है।
- सच बताना भी सेवा का एक रूप है
सरमा ने माता सीता को मायावी राम-मस्तक का सच बताया। उन्होंने झूठे भ्रम को दूर करके उन्हें विश्वास दिलाया कि श्रीराम सुरक्षित हैं। यह हमें सिखाता है कि किसी की सहायता केवल उसके दुख में साथ बैठकर ही नहीं, बल्कि उसे सही जानकारी देकर भी की जा सकती है।
- छोटी-सी सहायता भी किसी के जीवन में बड़ा बदलाव ला सकती है
त्रिजटा और सरमा ने युद्ध नहीं लड़ा, न ही उन्होंने किसी बड़े पद की इच्छा की। उन्होंने अपनी परिस्थितियों में रहकर जितना संभव था, उतना सहयोग दिया। उनका योगदान हमें याद दिलाता है कि किसी की जिंदगी में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए हमेशा बड़े साधनों की आवश्यकता नहीं होती।
इस दीपावली किसी के जीवन में आशा का दीप जलाएँ
त्रिजटा और सरमा की कथा हमें आज के समाज के उन लोगों की याद दिलाती है, जो किसी कठिन परिस्थिति से गुजर रहे हैं और जिन्हें केवल सहानुभूति नहीं, बल्कि वास्तविक सहयोग की आवश्यकता है।
किसी अस्पताल में उपचार करा रहा मरीज, लंबे समय से बीमारी से जूझ रहा व्यक्ति, दुर्घटना के बाद पुनर्वास की प्रक्रिया से गुजर रहा दिव्यांगजन या शिक्षा और रोजगार के अवसरों की तलाश कर रहा कोई व्यक्ति—इन सभी के जीवन में सही समय पर मिला सहयोग नई उम्मीद जगा सकता है।
कई बार किसी के पास बैठकर उसकी बात सुनना, उसे सही जानकारी देना, इलाज और पुनर्वास की उपलब्ध सुविधाओं के बारे में बताना या आवश्यक सहायक उपकरण उपलब्ध कराने में मदद करना बहुत बड़ा योगदान बन जाता है।
इस दीपावली आप भी एक छोटा-सा संकल्प ले सकते हैं।
किसी जरूरतमंद मरीज से मिलिए, उसका हालचाल पूछिए और संभव हो तो उसके उपचार में सहयोग कीजिए। किसी दिव्यांग व्यक्ति या परिवार को शिक्षा, रोजगार, पुनर्वास और सहायक उपकरणों से जुड़ी उपलब्ध सुविधाओं की जानकारी दीजिए।
अपनी सामर्थ्य के अनुसार किसी जरूरतमंद परिवार के साथ त्योहार की खुशियाँ बाँटिए।
क्योंकि दीपावली केवल घरों में दीपक जलाने का पर्व नहीं है। यह दूसरों के जीवन में आशा, विश्वास और खुशियाँ पहुँचाने का भी अवसर है।
जिस तरह त्रिजटा ने माता सीता को आशा दी और सरमा ने उन्हें सच बताकर संभाला, उसी तरह हम भी किसी जरूरतमंद के जीवन में सहारा बन सकते हैं।
कभी-कभी एक सच्चा शब्द, थोड़ी-सी मदद और किसी का साथ ही अंधकार में जलता हुआ दीपक बन जाता है।
बोलिए—
माता सीता की जय!
त्रिजटा माता की जय!
सरमा माता की जय!
भगवान श्रीराम की जय!
श्री राम जय राम जय जय राम।
