ॐ गं गणपतये नमः।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
धनतेरस का पर्व आते ही घरों में तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं। कहीं नए बर्तन खरीदे जाते हैं, कहीं सोने-चाँदी की वस्तुएँ लाई जाती हैं, तो कहीं माता लक्ष्मी और भगवान धन्वंतरि की पूजा की तैयारी होती है। संध्या होते ही घरों के आँगन और द्वार दीपकों की रोशनी से जगमगा उठते हैं।
लेकिन इस दिन एक दीपक ऐसा भी जलाया जाता है, जो बाकी दीपकों से अलग माना जाता है। इसे यम दीपदान या यम दीपक कहा जाता है। कई परिवारों में यह दीपक घर के बाहर दक्षिण दिशा की ओर रखकर यमराज से परिवार की सुख-समृद्धि और अकाल मृत्यु से रक्षा की प्रार्थना की जाती है। अलग-अलग क्षेत्रों में इसकी विधि और परंपरा में अंतर हो सकता है।
आखिर धनतेरस जैसे शुभ पर्व पर मृत्यु के देवता यमराज के लिए दीपक क्यों जलाया जाता है? इसके पीछे एक प्रचलित लोककथा सुनाई जाती है। इस कथा में एक राजकुमार, उसकी नवविवाहिता पत्नी और मृत्यु के देवता यमराज का प्रसंग आता है।
राजा हिम और उनके पुत्र की भविष्यवाणी
बहुत समय पहले हिम नाम के एक राजा थे। लंबे इंतजार और प्रार्थनाओं के बाद उनके घर एक पुत्र का जन्म हुआ। राजमहल में उत्सव मनाया गया और पूरे राज्य में खुशियाँ छा गईं।
राजकुमार के जन्म के बाद राजा ने ज्योतिषियों को बुलाकर उसकी कुंडली दिखाई। ज्योतिषियों ने गणना करने के बाद बताया कि राजकुमार का भविष्य तो उज्ज्वल है, लेकिन उनके जीवन से जुड़ी एक कठिन भविष्यवाणी भी है।
उन्होंने कहा कि राजकुमार की शादी के चौथे दिन साँप के डँसने से उनकी मृत्यु होने का योग है।
यह सुनकर राजा और रानी बहुत दुखी हुए। राजा ने अपने पुत्र को इस अनहोनी से बचाने का निश्चय किया। लोककथा के अनुसार, उन्होंने राजकुमार को विवाह से दूर रखते हुए शिक्षा और प्रशिक्षण के लिए आश्रम भेज दिया।
समय बीतता गया। राजकुमार बड़े हुए, शिक्षा प्राप्त की और एक तेजस्वी युवक बने। लेकिन नियति से जुड़ी वह भविष्यवाणी राजा के मन में बनी रही।
राजकुमार का विवाह और पत्नी का संकल्प
एक दिन राजकुमार की मुलाकात दूसरे राज्य की राजकुमारी से हुई। दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगे और कुछ समय बाद उनका विवाह हो गया।
विवाह के बाद जब राजकुमार ने अपनी पत्नी को उस भविष्यवाणी के बारे में बताया, तो वह चिंतित हो उठी। उसे पता चला कि विवाह के चौथे दिन साँप के डँसने से उसके पति की मृत्यु होने की आशंका बताई गई थी।
लेकिन उसने घबराने के बजाय अपने पति का साथ देने का संकल्प लिया। उसने मन में ठान लिया कि वह उस रात उन्हें अकेला नहीं छोड़ेगी और पूरी रात उन्हें जगाए रखेगी।
दीपकों और आभूषणों से जगमगा उठा महल
लोककथा के अनुसार, विवाह के चौथे दिन की रात आने पर राजकुमार की पत्नी ने एक विशेष तैयारी की।
उसने अपने सोने-चाँदी के आभूषण और सिक्के इकट्ठे किए तथा उन्हें शयन-कक्ष के द्वार पर एक ढेर के रूप में रख दिया। इसके आसपास अनेक दीपक जलाए गए। दीपकों की रोशनी और आभूषणों की चमक से द्वार का पूरा स्थान जगमगा उठा।
इसके बाद वह अपने पति के पास बैठ गई। उसने निश्चय किया कि रातभर उन्हें सोने नहीं देगी। वह कभी गीत गाती, कभी कथाएँ सुनाती और कभी उनसे बातचीत करती रही।
रात गहराती गई। जब भी राजकुमार की आँखें नींद से बोझिल होने लगतीं, पत्नी उनसे कोई बात करने लगती या उन्हें कोई कथा सुनाने लगती। इस तरह वह पूरी रात उनके साथ जागती रही।
यमराज का आगमन और दीपकों की रोशनी
कथा के अनुसार, उसी रात यमराज राजकुमार के प्राण लेने के लिए सर्प का रूप धारण करके वहाँ पहुँचे।
जब वे शयन-कक्ष के द्वार तक आए, तो सामने जलते हुए दीपकों और सोने-चाँदी के आभूषणों की चमक देखकर ठिठक गए। द्वार पर रखे उस ढेर के कारण उनके लिए भीतर जाना कठिन हो गया।
वे उसी ढेर पर ठहर गए। तभी भीतर से राजकुमार की पत्नी के गीत और कथाएँ उनके कानों तक पहुँचने लगीं।
वह पूरी रात अपने पति को जगाए रखने के लिए गीत गाती और कथाएँ सुनाती रही। यमराज भी उस मधुर स्वर को सुनते रहे। देखते ही देखते रात बीत गई और सुबह होने लगी।
लोककथा के अनुसार, भोर होते ही यमराज वहाँ से लौट गए। राजकुमार जीवित रहे और उनकी पत्नी का संकल्प सफल हुआ।
इस प्रकार इस लोककथा में पत्नी की सतर्कता, प्रेम और समर्पण को राजकुमार के जीवन की रक्षा का कारण बताया जाता है।
धनतेरस पर यम दीपदान की परंपरा क्यों है?
राजा हिम के पुत्र और उनकी पत्नी की यह कथा धनतेरस पर यम दीपदान की प्रचलित लोककथा के रूप में सुनाई जाती है।
धार्मिक परंपरा में कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी की संध्या को यमराज के नाम से दीपदान करने का उल्लेख मिलता है। कई परिवारों में घर के बाहर दीपक जलाकर उसे दक्षिण दिशा की ओर रखा जाता है। दक्षिण दिशा को परंपरागत रूप से यमराज की दिशा माना गया है।
मान्यता है कि इस दिन यमराज के लिए दीप अर्पित करने से परिवार के सदस्यों की अकाल मृत्यु का भय दूर होता है और उनके दीर्घायु तथा कल्याण की प्रार्थना की जाती है।
हालाँकि, दीपदान की विधि और उससे जुड़ी मान्यताएँ अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में भिन्न हो सकती हैं। इसलिए इसे श्रद्धा और पारिवारिक परंपरा के अनुसार किया जाता है।
इस कथा से हमें क्या सीख मिलती है?
राजा हिम के पुत्र और उनकी पत्नी की कथा केवल एक धार्मिक परंपरा से जुड़ी कहानी नहीं है। इसमें प्रेम, विश्वास, साहस और कठिन समय में अपने प्रियजनों का साथ देने का भाव भी दिखाई देता है।
राजकुमार की पत्नी ने कठिन परिस्थिति में धैर्य नहीं खोया। उसने अपने पति का साथ दिया और पूरी रात उनके पास बनी रही। इस कथा का एक सुंदर संदेश यह भी है कि किसी अपने के कठिन समय में उसके साथ रहना, उसकी बात सुनना और उसे भावनात्मक सहारा देना बहुत महत्वपूर्ण है।
आज भी हमारे आसपास कई ऐसे लोग हैं, जिन्हें इस साथ और संवेदना की आवश्यकता होती है। कोई वृद्ध व्यक्ति अकेलेपन से जूझ रहा हो सकता है, कोई मरीज लंबे उपचार के दौरान भावनात्मक सहारे की प्रतीक्षा कर रहा हो सकता है, तो कोई बच्चा अस्पताल में अपने परिवार के स्नेह और साथ को याद कर रहा हो सकता है।
ऐसे समय में किसी के पास बैठना, उसकी बात सुनना और उसे यह एहसास कराना कि वह अकेला नहीं है—अपने आप में एक बड़ा मानवीय कार्य है।
इस धनतेरस पर जलाएँ दीपक, बाँटें अपनापन
धनतेरस पर घर में दीपक जलाएँ, भगवान धन्वंतरि और माता लक्ष्मी का स्मरण करें तथा यमराज के लिए दीपदान की अपनी पारिवारिक परंपरा निभाएँ।
इसके साथ ही एक छोटा-सा संकल्प भी लें—इस वर्ष हम किसी जरूरतमंद, बुजुर्ग, मरीज या ऐसे व्यक्ति का सहारा बनेंगे, जिसे हमारी मदद और साथ की आवश्यकता है।
किसी जरूरतमंद के उपचार में सहयोग करना, दिव्यांगजन को आवश्यक सहायक उपकरण उपलब्ध कराने में मदद करना, बच्चों की शिक्षा में योगदान देना या किसी अकेले व्यक्ति के साथ कुछ समय बिताना—ये सभी सेवा और संवेदना के सार्थक रूप हैं।
क्योंकि दीपक केवल घर के द्वार को ही रोशन नहीं करता, वह हमें दूसरों के जीवन में भी आशा और अपनापन बाँटने की प्रेरणा देता है।
इस धनतेरस पर यम दीपदान के साथ सेवा, करुणा और सहयोग का दीप भी जलाएँ।
बोलिए—
यमराज की जय!
भगवान धन्वंतरि की जय!
दीपावली महापर्व की जय!
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
